Cash Kand: ‘कैश कांड’ से जुड़े बहुचर्चित मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली है। यह याचिका संसद में चल रही उस प्रक्रिया से संबंधित है, जिसके तहत उन्हें पद से हटाने की कार्यवाही आगे बढ़ाई जा रही है। शीर्ष अदालत ने दोनों पक्षों को लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश देते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस फैसले को न्यायपालिका और विधायिका के संबंधों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
जस्टिस यशवंत वर्मा ने लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनका तर्क है कि जजेज इन्क्वायरी एक्ट के तहत किसी न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया तभी आगे बढ़ सकती है, जब लोकसभा और राज्यसभा—दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार किया जाए। इसके बाद ही एक संयुक्त समिति गठित की जा सकती है। उनका कहना है कि चूंकि राज्यसभा में प्रस्ताव अभी लंबित है, इसलिए केवल लोकसभा स्पीकर द्वारा समिति बनाना कानून के विरुद्ध है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस वर्मा ने समिति के समक्ष पेश होने की तय समय सीमा बढ़ाने की भी मांग की। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने साफ किया कि उन्हें 12 जनवरी को ही तीन सदस्यीय समिति के सामने पेश होकर अपना पक्ष रखना होगा। यह आदेश इस बात का संकेत माना जा रहा है कि कोर्ट संसदीय प्रक्रिया में अनावश्यक देरी के पक्ष में नहीं है।
कैश से जुड़े मामले की जड़ 14-15 मार्च 2025 की रात की घटना है, जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान फायर ब्रिगेड को स्टोर रूम से जले हुए नोटों की गड्डियां मिलीं। इनका वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। उस समय जस्टिस वर्मा घर पर मौजूद नहीं थे और उनकी पत्नी ने पुलिस व फायर सर्विस को सूचना दी थी। शुरुआती जांच में इस नकदी को अनएकाउंटेड बताया गया।
घटना के करीब एक सप्ताह बाद जस्टिस वर्मा का दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया। फिलहाल उन्हें कोई न्यायिक कार्य आवंटित नहीं किया गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर एक नई बहस छेड़ दी है।
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