भोपाल, दो और तीन दिसंबर 1984 की रात के साथ भोपाल गैस त्रासदी सुनते ही आज भी बहुतों की आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं। इस दिन को भौतिकता की ओर अग्रसर मानव के अधूरे और असुरक्षित विकासशील संरचना के परिणाम को हजारों लोगों ने करीब से देखा, लेकिन उनमें हजारों लोगों ने कुछ ही घंटों में अपने प्राण गंवा दिए। इसी दिन ऐसा अध्याय लिखा गया, जिसमें भोपाल गैस त्रासदी के अलावा ज्यादा कुछ नहीं है। कारखाने को जिसने करीब से देखा है, उसका कहना है कि जान बचाने के लिए बहुत से लोग भागने लगे।
वह गिरते गए, हांफते रहे, लेकिन फिर भागने की कोशिश में जुट गए। बहुत से लोगों की मौत इस कारण भी हुई थी। दरअसल, भोपाल गैस त्रासदी का काला अध्याय, यूनियन कार्बाइड कारखाने से जुड़ा है। इतिहास बताता है कि भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने से बेहद जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट का रिसाव दो और तीन दिसंबर 1984 की रात हुआ था। इसमें 5,479 लोगों की जान गई थी। वैज्ञानिक युग में इससे बड़ी आपदा और नहीं मानी गई है। इस त्रासदी में हजारों लोग अपंग भी हुए थे। इतिहास में यह त्रासदी तो दर्ज ही है, कारखाने का कचरा भी कलंक बना हुआ था। लेकिन दशकों बाद इस कारखाने के कचरे का निस्तारण कर दिया गया। जो भी कुछ मिट्टी आदि में मिला हुआ है, उसका निस्तारण भष्मीकरण प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, इस कारखाने का विषैला कचरा हाल के माह तक जमा था। यह कारखाना मध्यप्रदेश के पीथमपुर में है। इसमें कुल 337 टन कचरा था। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देश पर कचरे का निस्तारण किया गया है। कोर्ट ने भोपाल गैस त्रासदी के लिए इसे जिम्मेदार माना है। क्षेत्रीय लोगों की सुरक्षा के लिहाज से इसे नष्ट करना जरूरी था। यह कचरा लोगों की जान से खिलवाड़ बन सकता था। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी श्रीनिवास द्विवेदी के हवाले से बताया गया कि पीथमपुर में स्थित एक निजी अपशिष्ट निपटान संयंत्र में 5 मई की शाम से शुरू हुए भस्मिकरण का कार्य 29-30 जून की रात तक किया गया। यूनियन कार्बाइड कारखाने के कचरे को निस्तारण करने में 270 किलोग्राम प्रति घंटे की दर से जलाया गया। इस दौरान केंद्र और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के तकनीकी विशेषज्ञ निगरानी में लगे रहे। पूरी प्रक्रिया में पार्टिकुलेट मैटर, नाइट्रोजन ऑक्साइड, मर्करी, सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, हाइड्रोजन फ्लोराइड, कैडमियम और अन्य भारी धातुओं का उत्सर्जन के कारण सुरक्षा के उपाय आसपास के गांवों तारपुरा, चीराखान और बजरंगपुरा में ऑनलाइन तरीके अपनाए गए। कहीं भी किसी प्रकार की परेशानी नहीं पाई गई है।
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