India US trade deal: भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील को देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम मील का पत्थर बताते हुए नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के सीईओ और एमडी आशीष कुमार चौहान ने कहा है कि इस समझौते से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी। उन्होंने कहा कि यह डील भारत के लिए रणनीतिक, आर्थिक और वैश्विक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
NSE के सीईओ आशीष कुमार चौहान ने बताया कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर लंबे समय से उम्मीद की जा रही थी और अब यह तत्काल प्रभाव से लागू हो चुकी है। उन्होंने इसकी तुलना भारत-यूरोपीय संघ ट्रेड डील ((India-EU trade deal) से करते हुए कहा कि जहां भारत-ईयू समझौता अगले छह महीनों में लागू होगा, वहीं अमेरिका के साथ यह डील तुरंत लागू की गई है, जो इसे और अधिक प्रभावी बनाती है।
एनएसई सीईओ ने कहा कि भारत आज दुनिया का ऐसा देश बन चुका है, जिसके पास विशाल मानव संसाधन, उच्च तकनीक की समझ और नई प्रौद्योगिकियों को तेजी से अपनाने की क्षमता है। यही वजह है कि विकसित देश भारत के साथ व्यापारिक साझेदारी के लिए उत्सुक हैं। इस डील से भारत का निर्यात बढ़ेगा, जिससे उत्पादन और रोजगार दोनों में तेजी आएगी।

चौहान ने बताया कि अमेरिकी रेसिप्रोकल टैरिफ (Reciprocal Tariff) 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किए जाने से भारत के श्रम-प्रधान उद्योगों को सीधा लाभ मिलेगा। खास तौर पर चमड़ा उद्योग, कपड़ा सेक्टर और समुद्री उत्पादों के निर्यात में बढ़ोतरी होगी। इससे छोटे और मध्यम उद्योगों को भी मजबूती मिलेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा।
एनएसई प्रमुख ने भरोसा जताया कि आने वाले 10 वर्ष भारत के लिए स्वर्ण काल साबित होंगे। उन्होंने कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक बदलावों के बीच भारत एक भरोसेमंद व्यापारिक साझेदार के रूप में उभर रहा है। यह स्थिति निवेश, उत्पादन और निर्यात तीनों क्षेत्रों में भारत को लाभ पहुंचाएगी।

चौहान ने कहा कि पोर्टफोलियो निवेशक इस ट्रेड डील को लेकर बेहद सकारात्मक हैं। निवेशकों को उम्मीद है कि इससे कंपनियों के मुनाफे में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। साथ ही उन्होंने बताया कि घरेलू निवेशकों का भरोसा भी लगातार बढ़ रहा है और हर महीने नए निवेशक बाजार से जुड़ रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 30-35 वर्षों तक अमेरिका और यूरोप के कई देश चीन का समर्थन करते रहे, लेकिन अब वे उसे प्रतिद्वंद्वी मानने लगे हैं। ऐसे में भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के देशों के लिए एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा है। इन देशों के साथ व्यापार बढ़ाकर भारत चीन को प्रभावी प्रतिस्पर्धा दे सकता है।
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