RBI Repo rate: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) आज रेपो रेट को लेकर अपना अहम फैसला सुनाने वाली है। तीन दिन तक चली इस बैठक के नतीजों पर शेयर बाजार, बॉन्ड मार्केट, बैंकिंग सेक्टर और आम कर्जदारों की नजर बनी हुई है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि दिसंबर 2025 में ब्याज दर में कटौती के बाद फरवरी की इस नीति में आरबीआई फिलहाल यथास्थिति बनाए रख सकता है। हालांकि, सबसे अहम पहलू यह होगा कि केंद्रीय बैंक आगे की मौद्रिक नीति को लेकर क्या संकेत देता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत की आर्थिक वृद्धि फिलहाल मजबूत बनी हुई है। घरेलू मांग में सुधार, सरकारी खर्च और निर्यात में संभावित तेजी ने विकास को सहारा दिया है। डीबीएस बैंक की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव के अनुसार, वैश्विक जोखिमों में कमी और अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के बाद आरबीआई के पास नीतिगत रूप से ज्यादा लचीलापन है। फिर भी, केंद्रीय बैंक जल्दबाजी में ब्याज दरों में और कटौती करने से बच सकता है।
हाल के महीनों में खुदरा महंगाई में नरमी जरूर देखने को मिली है, लेकिन रुपये पर दबाव और बैंकिंग सिस्टम में डिपॉजिट जुटाने की चुनौतियां आरबीआई के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। इसके अलावा, पोर्टफोलियो आउटफ्लो का जोखिम भी बना हुआ है। राधिका राव का कहना है कि इन्हीं कारणों से आरबीआई आगे रेट कट से दूरी बनाए रख सकता है और लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर ज्यादा ध्यान देगा।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आरबीआई नकदी प्रबंधन, सरकारी बॉन्ड बाजार को स्थिर रखने और मुद्रा प्रबंधन जैसे उपायों को प्राथमिकता दे सकता है। अनुमान है कि इस तिमाही और अप्रैल-जून 2026 के दौरान भी सरकारी बॉन्ड की खरीद जारी रह सकती है। गौर करने वाली बात यह है कि नीतिगत ब्याज दर में ढील के बावजूद हाल के समय में सरकारी बॉन्ड यील्ड में लगातार तेजी देखी गई है। यही वजह है कि केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति में फिलहाल कोई बड़ा बदलाव न करे।

एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMO) की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आरबीआई किन पात्र सिक्योरिटीज का चयन करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही लिक्विडिटी इंजेक्शन की कुल मात्रा समान रहे, लेकिन सही सिक्योरिटीज का चुनाव बाजार पर गहरा असर डाल सकता है। इसी आधार पर एसबीआई रिसर्च का मानना है कि इस नीति में आरबीआई यथास्थिति बनाए रखेगा।
पिछली मौद्रिक नीति के बाद सबसे बड़ा बदलाव भारत के लिए वैश्विक व्यापार के मोर्चे पर देखने को मिला है। भारत-यूरोपीय संघ और भारत-अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौतों के बाद भारत पर लगने वाला शुल्क 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत रह गया है। एसबीआई रिसर्च के अनुसार, इससे भारत एशियाई देशों में सबसे कम शुल्क वाले देशों में शामिल हो गया है, जिससे भारतीय उत्पादों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा और निर्यात क्षमता मजबूत होगी।
अन्य प्रमुख खबरें
West Asia War से Energy Crisis गहराया: 40 से अधिक Oil-Gas ठिकाने तबाह, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खतरा
वैश्विक तनाव का असरः Sensex 1,800 अंक टूटा, बाजार में मची हलचल, निवेशक परेशान
Zomato Platform Fee Hike: ऑनलाइन खाना मंगवाना हुआ महंगा, Zomato ने बढ़ाई प्लेटफॉर्म फीस
Petrol Diesel Price: प्रीमियम पेट्रोल के बढ़े दाम, इंडस्ट्रियल डीजल भी 22 रुपये हुआ महंगा
सोने की चमक फीकी: Bullion Market में बड़ी गिरावट, चांदी भी फिसली, निवेशकों में सतर्कता बढ़ी
MIddle East में राहत की उम्मीद से शेयर बाजार में जोरदार उछाल, BSE Sensex 75,000 के पार
HDFC बैंक पर RBI का भरोसा बरकरार, अतानु चक्रवर्ती के इस्तीफे के बीच निवेशकों को राहत
Fed के फैसले से Gold-Silver की चमक फीकी, कीमतों में तेज गिरावट से निवेशक चिंतित
रेलवे का किफायती प्लानः ट्रेनों में Non-AC कोच की बढ़ोतरी, किराए में 45% सब्सिडी से राहत