मोदी सरकार का ₹37,500 करोड़ का मास्टरप्लान! कोयले से बनेगी गैस, बदलेगा भारत का ऊर्जा भविष्य

खबर सार :-
केंद्र सरकार की 37,500 करोड़ रुपए की कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण योजना ऊर्जा सुरक्षा, रोजगार और औद्योगिक विकास के लिहाज से बड़ा कदम मानी जा रही है। इससे आयात पर निर्भरता घटेगी, घरेलू उत्पादन बढ़ेगा और हजारों रोजगार सृजित होंगे। लंबी अवधि की नीतिगत स्थिरता और वित्तीय प्रोत्साहन से निजी निवेश को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जिससे भारत आत्मनिर्भर ऊर्जा अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ सकेगा।

मोदी सरकार का ₹37,500 करोड़ का मास्टरप्लान! कोयले से बनेगी गैस, बदलेगा भारत का ऊर्जा भविष्य
खबर विस्तार : -

Coal Gasification Scheme Approval: देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए 37,500 करोड़ रुपए की महत्वाकांक्षी योजना को मंजूरी दे दी।

सरकार का मानना है कि इस योजना से न केवल देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी, बल्कि रोजगार और औद्योगिक विकास को भी नई गति मिलेगी।सरकारी बयान के मुताबिक, इस योजना के तहत कोयला उत्पादक क्षेत्रों में करीब 25 नई परियोजनाएं विकसित की जाएंगी, जिनसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 50,000 रोजगार सृजित होने की संभावना है।

2030 तक 10 करोड़ टन गैसीकरण का लक्ष्य

केंद्र सरकार ने वर्ष 2030 तक 10 करोड़ टन कोयले के गैसीकरण का राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित किया है। नई योजना इसी लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसके तहत लगभग 7 करोड़ टन कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण का लक्ष्य रखा गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, गैसीकरण तकनीक के जरिए कोयले को सिंथेटिक गैस में बदला जाता है, जिसका उपयोग उर्वरक, ईंधन, रसायन और ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है। इससे देश को आयातित एलएनजी, अमोनिया, मेथनॉल और यूरिया पर निर्भरता घटाने में मदद मिलेगी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत वर्तमान में एलएनजी का 50 प्रतिशत से अधिक, यूरिया का करीब 20 प्रतिशत, अमोनिया का लगभग 100 प्रतिशत और मेथनॉल का 80 से 90 प्रतिशत आयात करता है।

निवेशकों को मिलेगा लंबी अवधि का भरोसा

इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सरकार ने गैर-विनियमित क्षेत्र (एनआरएस) लिंकेज नीलामी ढांचे के तहत कोयला लिंकेज की अवधि को बढ़ाकर 30 वर्ष कर दिया है। इससे गैसीकरण परियोजनाओं में निवेश करने वाली कंपनियों को दीर्घकालिक नीतिगत स्थिरता और भरोसा मिलेगा। ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि लंबी अवधि के कोयला लिंकेज से निजी और सार्वजनिक कंपनियां बड़े निवेश के लिए आगे आएंगी। इससे नई तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ेगा और घरेलू उत्पादन क्षमता मजबूत होगी।

परियोजनाओं को मिलेगा वित्तीय प्रोत्साहन

सरकार ने इस योजना के तहत कंपनियों को वित्तीय सहायता देने का भी प्रावधान किया है। परियोजनाओं को संयंत्र और मशीनरी की लागत का अधिकतम 20 प्रतिशत तक प्रोत्साहन दिया जाएगा। इसके अलावा, परियोजनाओं का चयन पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से किया जाएगा। इसमें परियोजना लागत, कोयला इनपुट और सिंथेटिक गैस आउटपुट को आधार बनाकर मूल्यांकन किया जाएगा। सरकारी बयान के अनुसार, प्रोत्साहन राशि चार समान किस्तों में दी जाएगी, जो परियोजना के लक्ष्यों की पूर्ति से जुड़ी होगी।

एक परियोजना पर 5,000 करोड़ तक सहायता

योजना के तहत वित्तीय सहायता की अधिकतम सीमा भी तय की गई है। किसी एक परियोजना के लिए अधिकतम 5,000 करोड़ रुपए तक का प्रोत्साहन दिया जा सकेगा। वहीं, किसी एक उत्पाद श्रेणी-सिंथेटिक प्राकृतिक गैस और यूरिया को छोड़कर-के लिए सहायता की सीमा 9,000 करोड़ रुपए रखी गई है। इसके अलावा, किसी एक कंपनी समूह को सभी परियोजनाओं के लिए अधिकतम 12,000 करोड़ रुपए तक का लाभ मिल सकेगा। सरकार का अनुमान है कि प्रस्तावित 75 मिलियन टन गैसीकरण से हर साल करीब 6,300 करोड़ रुपए की अतिरिक्त आय उत्पन्न होगी। साथ ही, जीएसटी और अन्य करों के जरिए सरकारी राजस्व में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

भारत के विशाल कोयला भंडार का मिलेगा बेहतर उपयोग

भारत दुनिया के सबसे बड़े कोयला भंडार वाले देशों में शामिल है। देश के पास लगभग 401 अरब टन कोयला और 47 अरब टन लिग्नाइट भंडार मौजूद हैं। वर्तमान में भारत के ऊर्जा मिश्रण में कोयले की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से अधिक है। सरकार का मानना है कि गैसीकरण तकनीक से इन संसाधनों का अधिक प्रभावी और पर्यावरण-अनुकूल उपयोग संभव होगा। इससे ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ रासायनिक और उर्वरक उद्योगों को भी मजबूती मिलेगी।

आयात बिल कम करने की बड़ी तैयारी

वित्त वर्ष 2025 में भारत का एलएनजी, यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट, अमोनिया, कोकिंग कोल, मेथनॉल और डीएमई जैसे उत्पादों पर आयात बिल करीब 2.77 लाख करोड़ रुपए रहा। सरकार को उम्मीद है कि गैसीकरण परियोजनाओं के बढ़ने से आने वाले वर्षों में इस आयात बिल में बड़ी कमी आएगी। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि यह योजना सफल रहती है तो भारत ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी छलांग लगा सकता है।

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