नई दिल्लीः दुबई स्थित एमिरेट्स इन्वेस्टमेंट बैंक के वेल्थ मैनेजमेंट निदेशक डॉ. धर्मेश भाटिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई एक साल के आर्थिक समायोजन ढांचे की अपील को सही और व्यावहारिक कदम बताया है। उन्होंने कहा कि यह पहल अल्पकालिक आर्थिक दबाव को संभालने और देश की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। सोमवार को समाचार एजेंसी से बातचीत में डॉ. भाटिया ने कहा कि यदि नीतियां और आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल बनी रहती हैं तो अगले छह से नौ महीनों में अर्थव्यवस्था में सुधार स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
डॉ. भाटिया ने कहा कि अस्थायी आर्थिक चुनौतियां किसी भी अर्थव्यवस्था के सामान्य चक्र का हिस्सा होती हैं। उनका मानना है कि शुरुआती महीनों में आने वाला दबाव समय के साथ संतुलित किया जा सकता है। उन्होंने कहा, “तीन महीने का आर्थिक दबाव पूरी तरह से रिकवर किया जा सकता है, बशर्ते सरकार और बाजार दोनों मिलकर संतुलित रणनीति अपनाएं।”
प्रधानमंत्री मोदी की एक साल के आर्थिक समायोजन की अपील पर उन्होंने कहा कि यह समयसीमा उत्पादन और व्यापक आर्थिक चक्र के अनुरूप है। उन्होंने बताया कि अधिकांश उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों का मूल्यांकन सालाना आधार पर किया जाता है, इसलिए छोटे समय के झटकों को लंबे समय में नियंत्रित किया जा सकता है। उनके अनुसार, यदि शुरुआती तीन महीनों में आर्थिक तनाव रहता है तो उसका असर अगले छह से नौ महीनों तक दिखाई दे सकता है, लेकिन सुधारात्मक कदमों से इसकी भरपाई संभव है।
डॉ. भाटिया ने कहा कि आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा खपत को नियंत्रित करने और आयात निर्भरता कम करने पर जोर दिया जा रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की गैर-जरूरी सोने की खरीद कम करने और वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने की अपील को भी दूरदर्शी कदम बताया। उनके अनुसार, इन उपायों का उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा करना और व्यापार घाटे को नियंत्रित रखना है।
उन्होंने कहा कि भारत का व्यापार घाटा मुख्य रूप से कच्चे तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक्स के आयात की वजह से बढ़ता है। ऐसे में सरकार का प्रयास है कि गैर-जरूरी आयातों को सीमित किया जाए ताकि अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। उन्होंने कहा, “यह मूल रूप से आयात कम करने और खपत को नियंत्रित करने की अपील है, जिससे आर्थिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।”
डॉ. भाटिया ने विशेष रूप से ऊर्जा आयात को भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि सोने के आयात को कम किया जा सकता है, लेकिन तेल पर निर्भरता तत्काल कम करना आसान नहीं है। उन्होंने कहा, “हम सोने के बिना रह सकते हैं, लेकिन तेल के बिना नहीं। तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर आयात बिल और डॉलर के बहाव पर पड़ता है।”
उन्होंने कहा कि सरकार के ऐसे कदमों का उद्देश्य कम समय में आर्थिक दबाव को नियंत्रित करना है, ताकि मध्यम अवधि में अर्थव्यवस्था और अधिक मजबूत होकर उभर सके। उनके अनुसार, यदि सरकार और उद्योग जगत मिलकर योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ते हैं तो भारत आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है।
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