सिर्फ 4 महीने, 22 फांसी! क्या देश के सबसे सख्त जज बन गए हैं जस्टिस रवि कुमार?
खबर सार :-
मुजफ्फरनगर में पदस्थ जस्टिस रवि कुमार दिवाकर के ताबड़तोड़ फैसलों ने न्यायिक गलियारों में हलचल मचा दी है। जानिए आखिर क्या है उनकी कार्यशैली का असली सच।
खबर विस्तार : -
मुजफ्फरनगर: अदालती कार्यवाही इन दिनों एक खास वजह से चर्चा में है। एडीजे के तौर पर तैनात जस्टिस रवि कुमार दिवाकर पिछले कुछ महीनों में अपने फैसलों को लेकर सुर्खियों के केंद्र में आ गए हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो अप्रैल से लेकर अब तक उन्होंने जिस तेजी और सख्ती के साथ मामलों का निपटारा किया है, उसने कानूनविदों और आम लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। विशेष रूप से गंभीर अपराधों में मौत की सजा सुनाने की बढ़ती संख्या ने न्यायिक सक्रियता पर एक नई बहस को जन्म दिया है।
अपराध की गंभीरता के प्रति शून्य सहिष्णुता
अगर हम जस्टिस रवि कुमार दिवाकर की कार्यप्रणाली को करीब से देखें, तो यह साफ नजर आता है कि वे मामलों को केवल कानूनी फाइलों के तौर पर नहीं, बल्कि समाज में न्याय के प्रति डर और विश्वास पैदा करने के एक माध्यम के रूप में देख रहे हैं। समीर सैफी हत्याकांड से लेकर एक ही परिवार के चार लोगों की हत्या तक, उनके द्वारा सुनाए गए फैसले यह स्पष्ट करते हैं कि वे अपराध की गंभीरता के प्रति शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति अपना रहे हैं। बरेली में अपने कार्यकाल के दौरान भी उन्होंने कई बड़े डकैती और हत्या के मामलों में सख्त रुख अपनाकर अपनी पहचान बनाई थी।
'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' की अदालती व्याख्या
भारतीय न्यायपालिका में 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' यानी बेहद दुर्लभ मामलों में ही फांसी की सजा का प्रावधान है। ऐसे में, जब जस्टिस रवि कुमार दिवाकर एक छोटे से अंतराल में लगातार डेथ पेनल्टी सुनाते हैं, तो कानूनी विशेषज्ञ भी सोचने पर मजबूर हो जाते हैं। क्या यह केवल मामलों की गंभीरता है या न्याय करने का उनका अपना अनूठा नजरिया? आलोचकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में मौत की सजा सुनाना निचली अदालतों के लिए एक बड़ा कदम है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि बढ़ते अपराधों पर लगाम लगाने के लिए ऐसी सख्ती समय की मांग है।
ज्ञानवापी से मुजफ्फरनगर तक का सफर
जस्टिस रवि कुमार दिवाकर का नाम केवल मौजूदा फैसलों से नहीं, बल्कि साल 2022 के उस ऐतिहासिक आदेश से भी जुड़ा है, जिसने उन्हें देशभर में घर-घर पहचान दिलाई। वाराणसी में सिविल जज के तौर पर ज्ञानवापी परिसर के सर्वे का उनका फैसला भारतीय कानूनी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है। उस दौरान उन्हें मिली धमकियों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बावजूद, उन्होंने अपने काम को जारी रखा। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में अपनी सेवाएं देने के बाद, आज मुजफ्फरनगर में भी उनकी कार्यशैली में वही गंभीरता और अडिगता दिखाई देती है।
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