यूपी रोडवेज: रखरखाव पर 5 करोड़ खर्च, फिर भी 30 बसें बंद, निजी एजेंसियों पर सवाल

खबर सार :-

उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के हसारी डिपो में रखरखाव पर हर वर्ष लगभग 5 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद करीब 30 बसें संचालन से बाहर हैं। निजी एजेंसियों की कार्यप्रणाली और निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं।
यूपी रोडवेज: रखरखाव पर 5 करोड़ खर्च, फिर भी 30 बसें बंद, निजी एजेंसियों पर सवाल

खबर विस्तार : -

ललितपुर: उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (यूपीएसआरटीसी) यात्रियों को बेहतर और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लगातार अपने बेड़े में नई बसें शामिल कर रहा है। हालांकि दूसरी ओर पुरानी बसों के रखरखाव और उनकी तकनीकी स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद बड़ी संख्या में बसों का संचालन से बाहर होना रखरखाव व्यवस्था और निजी एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा रहा है।

हर साल खर्च होते हैं 5 करोड़ रुपए

जानकारी के अनुसार, हसारी डिपो के बेड़े में इस समय करीब 150 बसें शामिल हैं। इनमें से लगभग 30 बसें खराब स्थिति के कारण संचालन से बाहर हैं, जबकि 22 बसों को कंडम घोषित करने के लिए मुख्यालय को प्रस्ताव भेजा गया है। अधिकारियों का कहना है कि इन बसों ने अपनी निर्धारित सेवा अवधि या तय किलोमीटर की सीमा पूरी कर ली है, इसलिए उन्हें कंडम घोषित करने की प्रक्रिया चल रही है।

परिवहन निगम के आंकड़ों के अनुसार, बसों के रखरखाव और मरम्मत पर हर वर्ष लगभग 5 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। डिपो में बसों की सर्विसिंग, तकनीकी जांच, पार्ट्स बदलने और अन्य मरम्मत कार्यों की जिम्मेदारी निजी एजेंसियों को सौंपी गई है। इसके बावजूद आए दिन बसों के ब्रेकडाउन होने और संचालन से बाहर होने की घटनाएं सामने आ रही हैं, जिससे रखरखाव की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।

यात्रियों का कहना है कि कई बार बसें यात्रा के दौरान ही खराब हो जाती हैं, जिससे उन्हें घंटों इंतजार करना पड़ता है। कई मामलों में यात्रियों को बीच रास्ते में दूसरी बस का इंतजार करना पड़ता है या वैकल्पिक साधनों का सहारा लेना पड़ता है। इससे न केवल यात्रियों को असुविधा होती है, बल्कि परिवहन निगम को भी अतिरिक्त संसाधन लगाने पड़ते हैं।

कंडम घोषित की प्रक्रिया

इस बीच एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आ रहा है कि जहां निजी बसें 20 वर्ष तक फिटनेस प्रमाणपत्र लेकर सड़कों पर संचालित होती रहती हैं, वहीं रोडवेज की बसों को 10 वर्ष की सेवा अवधि या 12 लाख किलोमीटर चलने के बाद कंडम घोषित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था को लेकर भी लोगों के बीच चर्चा है कि क्या बसों की उपयोगिता का आकलन केवल निर्धारित अवधि और किलोमीटर के आधार पर होना चाहिए या उनकी वास्तविक तकनीकी स्थिति को भी अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।

क्षेत्रीय प्रबंधक उमेश सी.एस. आर्य का कहना है कि परिवहन निगम की बसों का समय-समय पर रखरखाव और आवश्यक मरम्मत कराई जाती है। उनका कहना है कि निजी बसें भी खराब होती हैं, लेकिन रोडवेज के बेड़े में बसों की संख्या अधिक होने के कारण ब्रेकडाउन की घटनाएं अधिक दिखाई देती हैं। उन्होंने बताया कि निगम के निर्धारित मानकों के अनुसार 10 वर्ष की सेवा अवधि या 12 लाख किलोमीटर पूरे करने के बाद बसों को कंडम घोषित करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

हालांकि, डिपो की वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि रखरखाव पर भारी खर्च के बावजूद बसों की उपलब्धता और विश्वसनीयता अपेक्षित स्तर पर नहीं है। बताया जा रहा है कि लगभग हर दूसरे या तीसरे दिन किसी न किसी रूट पर बस के ब्रेकडाउन होने की सूचना अधिकारियों तक पहुंचती है। इसके कारण यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है और निगम को वैकल्पिक बसों की व्यवस्था करनी पड़ती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रखरखाव व्यवस्था की नियमित और स्वतंत्र समीक्षा की जाए, निजी एजेंसियों के कार्यों की प्रभावी निगरानी हो तथा खर्च और परिणाम का समय-समय पर मूल्यांकन किया जाए, तो बसों की खराबी की घटनाओं में कमी लाई जा सकती है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि परिवहन निगम रखरखाव प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करे, ताकि यात्रियों को सुरक्षित, समयबद्ध और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन सेवा उपलब्ध कराई जा सके।

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