यूपी में एनीमिया से निपटने के लिए FCM बनी नई उम्मीद, महिलाओं के इलाज में मिले सकारात्मक नतीजे
खबर सार :-
उत्तर प्रदेश में एनीमिया के इलाज के लिए ‘फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज’ (FCM) डोज के शुरुआती नतीजे सकारात्मक रहे हैं। अभी तक 10 हजार से ज्यादा डोज दी जा चुकी है।
खबर विस्तार : -
लखनऊ: गर्भावस्था के दौरान एनीमिया (यानी रेड ब्लड सेल्स की कमी) मां और नवजात शिशु की सेहत के लिए एक बड़ी चुनौती है। इससे निपटने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने गर्भवती महिलाओं में एनीमिया के इलाज के लिए 'फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज' (FCM) को शामिल करके अपने इलाज के तरीकों को बेहतर बनाने के कदम उठाए हैं। शुरुआती नतीजे बहुत अच्छे रहे हैं; विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि अब तक 10,000 से ज्यादा डोज दी जा चुकी हैं।
नेशनल हेल्थ मिशन की मिशन डायरेक्टर डॉ. पिंकी जोवेल के अनुसार, FCM की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि एनीमिया से पीड़ित गर्भवती महिलाओं के इलाज के लिए अक्सर सिर्फ आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां काफी नहीं होती हैं। कुछ महिलाओं को नियमित रूप से दवा लेने में मुश्किल, बुरे साइड इफेक्ट या गर्भावस्था के दौरान तेजी से हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ाने की जरूरत जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। वहीं, आयरन सुक्रोज से इलाज के लिए अक्सर कई बार अस्पताल जाना पड़ता है। FCM इलाज का एक ऐसा तरीका है जिसमें एक ही बार में आयरन की काफी ज्यादा डोज दी जा सकती है, जिससे हेल्थ सेंटरों पर बार-बार जाने की जरूरत कम हो जाती है।
स्क्रीन, रेफर, ट्रैक और ट्रीट' मॉडल पर फोकस
उन्होंने बताया कि राज्य में FCM के इस्तेमाल को पक्का करने के लिए इसे जरूरी दवाओं की सूची में शामिल करने, खरीद की व्यवस्था बनाने, डॉक्टरों और स्टाफ नर्सों की क्षमता बढ़ाने और सरकारी हेल्थ सेंटरों पर इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के उपाय किए गए। इस पूरी प्रक्रिया को गर्भवती महिलाओं में एनीमिया के लिए 'स्क्रीन, रेफर, ट्रैक और ट्रीट' मॉडल के साथ जोड़ा गया है, ताकि मरीज की शुरुआती पहचान से लेकर इलाज और फाॅलो-अप तक देखभाल लगातार बनी रहे। इस पहल में एक अहम पड़ाव फ़रवरी 2026 में रायबरेली में ट्रेनिंग प्रोग्राम की शुरुआत थी। इसके बाद, सीतापुर, हरदोई, रायबरेली, श्रावस्ती और बहराइच में फर्स्ट रेफरल यूनिट्स (FRUs) में तैनात डॉक्टरों और स्टाफ़ नर्सों को FCM के इस्तेमाल और एनीमिया के इलाज के मानकों के बारे में ट्रेनिंग देने की योजना लागू की गई।
यह भी पढ़ेंः- ओडिशाः बचाए गए ओरांगुटान भारत के नहीं, पांच बच्चों में से दो में एनीमिया
एनीमिया से पीड़ित महिलाओं की पहचान करना मकसद
इस ट्रेनिंग के लिए किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) और गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज, कानपुर को टेक्निकल पार्टनर के तौर पर शामिल किया गया। अभी राज्य के सभी जिलों में FCM का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके बाद, FCM सेवाओं को विकेंद्रीकृत करने की दिशा में कदम उठाए गए। मौजूदा रिपोर्ट के अनुसार, 28 अप्रैल 2026 को सीतापुर में डिसेंट्रलाइज़्ड FCM सेवाएं शुरू की गईं। इसका मकसद मध्यम से गंभीर एनीमिया से पीड़ित गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं की समय पर पहचान करना है, ताकि उन्हें इलाज के लिए बेवजह लंबी दूरी तय न करनी पड़े।
इंट्रावेनस आयरन थेरेपी को लागू करने पर भी जोर
राष्ट्रीय स्तर पर, 'एनीमिया मुक्त भारत' के लिए 2026 की गाइडलाइंस में गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए इंट्रावेनस आयरन थेरेपी को सुरक्षित और स्टैंडर्ड तरीके से लागू करने पर भी जोर दिया गया है। राज्यों को सलाह दी गई है कि वे चरणबद्ध तरीके से इसे अपनाएं, जिसकी शुरुआत जिला अस्पतालों और उच्च-स्तरीय स्वास्थ्य केंद्रों से हो। इस तरह, उत्तर प्रदेश में FCM का सफर सिर्फ स्वास्थ्य केंद्रों तक नई दवा पहुंचाने तक सीमित नहीं है; यह समय पर पहचान, रेफरल, प्रशिक्षित हेल्थकेयर स्टाफ, इलाज और फाॅलो-अप को एक साथ लाकर गर्भवती महिलाओं में एनीमिया के प्रबंधन को मजबूत करने की एक पहल है। आगे चलकर, इलाज की कवरेज, हीमोग्लोबिन के स्तर में सुधार, फाॅलो-अप दर और मां व नवजात शिशु के स्वास्थ्य नतीजों जैसे पैमानों के आधार पर इस पहल की प्रभावशीलता का आकलन करना जरूरी होगा।
कुसुमा देवी का हीमोग्लोबिन लेवल 12 ग्राम हुआ
रायबरेली की कुसुमा देवी FCM थेरेपी के फायदों का एक बेहतरीन उदाहरण हैं। अपनी प्रेग्नेंसी के आठवें महीने में, रोहनिया इलाके के छिपिया गांव की रहने वाली कुसुमा देवी (नाम बदला हुआ) को लगातार कमजोरी, थकान और हाथ-पैरों में झुनझुनी महसूस हो रही थी, क्योंकि उनका हीमोग्लोबिन लेवल गिरकर 6 ग्राम प्रति डेसीलीटर हो गया था। वह रेगुलर आयरन की गोलियां नहीं ले पा रही थीं क्योंकि वे उन्हें सूट नहीं करती थीं। इसके बाद, कम्युनिटी हेल्थ सेंटर के डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें FCM इंजेक्शन दिया गया। लगभग एक महीने बाद हुए फॉलो-अप टेस्ट से पता चला कि उनका हीमोग्लोबिन लेवल बढ़कर 12 ग्राम प्रति डेसीलीटर हो गया था। इसके बाद, 5 सितंबर को उनकी नॉर्मल डिलीवरी हुई और उन्होंने 2.8 किलोग्राम वजन वाले एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।
यह भी पढ़ेंः- कहीं आपकी थकान के पीछे तो नहीं एनीमिया? जानें आयरन की कमी के अनकहे संकेत
अन्य प्रमुख खबरें
-
जम्मू-कश्मीर के डोडा में फैल रहा लम्पी वायरस, पशुपालकों में बढ़ी चिंता
2026-10-09
-
राष्ट्रीय डाक सप्ताह की तैयारी, आधार सेवाओं पर विशेष अभियान
2026-10-09
-
हिमाचल में 110 कठिन मार्गों पर ड्रोन से पहुंचेगी डाक, 36 पर सेवा शुरू
2026-10-09
-
UP : 455 लेखपाल बने राजस्व निरीक्षक, जल्द जारी होंगे तैनाती के आदेश
2026-10-09
-
मध्य प्रदेश में 10-11 अक्टूबर को बारिश के आसार, IMD ने जताई संभावना
2026-10-09
-
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग, सपा का प्रदर्शन
2026-10-08
-
भोपाल के न्यू मार्केट में सिलेंडर ब्लास्ट, धू-धू कर जलीं दुकानें
2026-10-08
-
MP में आयुष्मान योजना का विरोध, संगठनों ने किया बहिष्कार का ऐलान
2026-10-08
-
बारिश और हवा के कारण तापमान में गिरावट, कल तक गोमती का जलस्तर घटने की उम्मीद
2026-10-08
-
UP: दुकान में आग लगने से मां-बेटी की जलकर मौत
2026-10-08
-
MP में चीतों की संख्या 60 पहुंची, CM बोले- वन्यजीव हमारे वनों के आभूषण
2026-10-08
-
हिमाचल में ओलावृष्टि से फसलों को नुकसान, 9 अक्टूबर तक बारिश का अलर्ट
2026-10-07
-
कुमाऊं में महिलाएं बना रहीं रेशम का धागा, स्वरोजगार के खुले नए रास्ते
2026-10-07
-
यूपी में 20 IPS अफसरों का तबादला, रवीना त्यागी बनी बाराबंकी की नई एसपी
2026-10-07
-
वृंदावन के गुरुकुल में सेप्टिक टैंक साफ कर रहे 4 छात्रों की मौत
2026-10-07