केवल एक्स-रे के भरोसे न करें टीबी (TB Diagnosis) का इलाज, 30 फीसदी मामलों में हो रही चूक

खबर सार :-

लखनऊ के सिविल अस्पताल में केवल एक्स-रे देखकर टीबी का इलाज शुरू करने के गलत मामले सामने आए हैं। डॉक्टरों के अनुसार 30% एक्स-रे रिपोर्ट भ्रामक हो सकती हैं। जानें टीबी की सटीक जांच और बचाव के उपाय।
केवल एक्स-रे के भरोसे न करें टीबी (TB Diagnosis) का इलाज, 30 फीसदी मामलों में हो रही चूक

खबर विस्तार : -

लखनऊ (Lucknow): राजधानी लखनऊ के अस्पतालों में सिर्फ छाती के एक्स-रे और शुरुआती लक्षणों को देखकर टीबी का इलाज शुरू कर देना मरीजों की सेहत के लिए बेहद घातक साबित हो रहा है। सिविल अस्पताल में हाल ही में ऐसे कई मामले देखने को मिले हैं, जहाँ मरीजों को क्षय रोग न होने के बावजूद महीनों तक इसकी हैवी एंटीबायोटिक्स दी जाती रहीं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि केवल एक्स-रे पर निर्भर रहकर दी जाने वाली दवाइयाँ शरीर के अन्य अंगों को भारी नुकसान पहुँचा सकती हैं, इसलिए सही TB Diagnosis (टीबी डायग्नोसिस) प्रक्रिया का पालन बेहद अनिवार्य है।

गलत रिपोर्ट से जोखिम: एक्स-रे में दिखने वाले हर धब्बे का मतलब टीबी नहीं

अहिमामऊ के रहने वाले 46 वर्षीय प्रेमचंद को लगातार खाँसी, सांस फूलने और वजन घटने पर एक निजी डॉक्टर को दिखाया गया। डॉक्टर ने एक्स-रे में बने धब्बों के आधार पर तुरंत टीबी की दवा चालू कर दी। हफ़्ते भर बाद भी जब राहत नहीं मिली, तो परिजन उन्हें डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिविल अस्पताल लेकर पहुंचे। वहाँ डॉक्टरों ने जब आधुनिक TB Diagnosis (टीबी डायग्नोसिस) प्रोटोकॉल के तहत विस्तृत जाँच की, तो पता चला कि उन्हें टीबी नहीं बल्कि फेफड़ों में गाँठ (लंग नोड्यूल) है।

सिविल अस्पताल के वरिष्ठ क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष दुबे का कहना है कि एक्स-रे में फेफड़ों के कैंसर, अस्थमा, ब्रॉन्काइटिस, लंग नोड्यूल्स और टीबी के लक्षण एक समान दिखाई दे सकते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 30 प्रतिशत मामलों में सिर्फ एक्स-रे पर आधारित आकलन गलत निकलता है। इसलिए बलगम की जाँच, सीबी-नॉट, जीन एक्सपर्ट और सीटी स्कैन के बिना अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना खतरनाक है।

उत्तर प्रदेश में एमडीआर का बढ़ता खतरा और बैक्टीरिया का स्वभाव

डॉ. दुबे ने जानकारी दी कि सिविल अस्पताल में हर महीने 150 से 200 नए मरीज आते हैं, जिनमें 2 से 3 मामले मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) टीबी के होते हैं। पूरे उत्तर प्रदेश में हर साल करीब 15 से 17 हजार एमडीआर मरीज चिह्नित किए जाते हैं।

टीबी का जीवाणु डार्विन के 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट' सिद्धांत पर काम करता है। यह जीवाणु चार अलग-अलग अवस्थाओं में रहता है। शुरुआती तीन तरह के जीवाणु दवाओं से नष्ट हो जाते हैं, लेकिन सुप्त (डॉरमेंट) अवस्था वाले जीवाणुओं पर सामान्य दवाइयाँ बेअसर साबित होती हैं। जब मरीज की इम्युनिटी कमजोर पड़ती है, तब ये दोबारा सक्रिय हो जाते हैं। अगर कोई मरीज बीच में इलाज छोड़ देता है, तो साधारण टीबी बदलकर एमडीआर और फिर एक्सडीआर का रूप ले लेती है, जिसका इलाज दो साल तक चलता है। सही समय पर और सटीक TB Diagnosis (टीबी डायग्नोसिस) की मदद से ही इस चक्र को तोड़ा जा सकता है।

संक्रमण का प्रसार और लखनऊ में आंकड़े

एक अनुपचारित टीबी रोगी एक साल में औसतन 15 स्वस्थ लोगों को संक्रमित कर सकता है। बंद, अंधेरे और नमी वाले स्थानों में यह जीवाणु छह महीने तक जीवित रह सकता है। लखनऊ जिले में दर्ज मरीजों के आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं:

वर्ष    दर्ज टीबी मरीज

2023      8,631

2024      9,317

2025      11,185

2026 (100 दिवसीय अभियान सहित)    9,370

ईबीयूएस (EBUS) तकनीक से होगी सटीक पहचान

सही TB Diagnosis (टीबी डायग्नोसिस) को बढ़ावा देने के लिए डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में अत्याधुनिक 'एंडोब्रोंकियल अल्ट्रासाउंड' (ईबीयूएस) सुविधा शुरू की गई है। संस्थान के श्वसन रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार वर्मा ने बताया कि इस तकनीक में बिना किसी चीर-फाड़ के, मुँह के जरिए पतली ट्यूब डालकर फेफड़ों के अंदरूनी हिस्से की लाइव तस्वीरें देखी जाती हैं। इससे टीबी, कैंसर और चेस्ट लिम्फ नोड्स की शुरुआती अवस्था में ही सटीक जाँच संभव हो जाती है।vजिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. एके सिंघल ने बताया कि यदि दो सप्ताह से अधिक समय तक खाँसी, हल्का बुखार या वजन घटने की समस्या रहे, तो तुरंत नजदीकी सरकारी केंद्र पर TB Diagnosis (टीबी डायग्नोसिस) कराएं। समय पर पहचान और पूरा इलाज ही इस बीमारी को समाप्त करने का एकमात्र रास्ता है।

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