जेपीएससी-जेएसएससी विवाद: सत्ता के गलियारों में सन्नाटा, हिरासत में विपक्ष, लोकतंत्र पर गहराते सवाल
खबर सार :-
झारखंड में जेपीएससी-जेएसएससी विवाद के बीच हिरासत में विपक्ष के नेता। विधानसभा सत्र के दौरान नेताओं की नजरबंदी से राज्य की राजनीति में मचा बवाल। जानें पूरा मामला।
खबर विस्तार : -
Ranchi : रांची की सड़कों पर आज एक अजीब सी खामोशी है। सत्ता के केंद्र मुख्यमंत्री आवास के पास की हलचल अचानक खेलगांव की चारदीवारी के अंदर सिमट गई है। जेपीएससी-जेएसएससी विवाद ने झारखंड की सियासत को जिस मोड़ पर लाकर खड़ा किया है, वह राज्य के लोकतांत्रिक इतिहास में एक चिंताजनक लकीर खींचता है। जब राज्य की विधानसभा का मानसून सत्र अपने पूरे शबाब पर हो, तब विपक्ष के नेताओं का एक साथ हिरासत में होना न केवल व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच के उस पतले संवाद को भी पूरी तरह खत्म कर देता है जो लोकतंत्र की असली जान है।
क्या अब बहस के लिए जेल ही एकमात्र जगह है?
सुबह की गुनगुनी धूप के साथ जब बाबूलाल मरांडी और आदित्य साहू जैसे दिग्गजों ने मुख्यमंत्री आवास की ओर कदम बढ़ाया, तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि दिन ढलने तक उन्हें एक कैंप जेल का रुख करना पड़ेगा। जेपीएससी-जेएसएससी विवाद को लेकर छात्रों का आक्रोश सड़क से लेकर सत्ता के गलियारों तक गूंज रहा है। सरकार के लिए यह महज एक कानून-व्यवस्था का सवाल हो सकता है, लेकिन विपक्ष इसे सीधे तौर पर 'तानाशाही' का चश्मा पहना रहा है। अमर कुमार बाउरी के तेवर बता रहे हैं कि लड़ाई अब केवल परीक्षाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह अधिकारों और मर्यादाओं की जंग में बदल चुकी है। जेल के अंदर से आ रही आवाजें अब विधानसभा के शोर को फीका कर रही हैं।
सदन की कार्यवाही और शून्य होता विपक्ष
विधानसभा का सत्र चल रहा हो और विपक्ष के नेता पुलिस की हिरासत में हों - यह स्थिति किसी भी संसदीय लोकतंत्र के लिए सुखद नहीं कही जा सकती। बाउरी ने जो सवाल उठाए हैं, वे तार्किक हैं। क्या सत्ता पक्ष के चंद विधायकों की मौजूदगी में सदन की गरिमा बची रहती है? जेपीएससी-जेएसएससी विवाद ने एक संवैधानिक संकट को जन्म दे दिया है। विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका पर उठे सवाल यह दर्शाते हैं कि राज्य की संस्थाओं के बीच का भरोसा किस कदर दरक रहा है। यदि सदन के भीतर विपक्ष की आवाज को बाहर की सलाखें दबाएंगी, तो जनता की शिकायतों का समाधान आखिर किस मंच पर होगा?
अब आगे क्या: रिहाई या आर-पार?
सरकार के सामने अब दो ही रास्ते हैं। या तो वह इन नेताओं को तत्काल रिहा कर एक स्वस्थ राजनीतिक माहौल बनाए, या फिर इसी तरह की सख्ती अपनाकर विवाद को और तूल दे। अमर कुमार बाउरी की चेतावनी साफ है- दोषी हैं तो जेल भेजो, नहीं तो रिहाई दो। यह मामला अब केवल प्रशासनिक दांव-पेंच का नहीं, बल्कि साख का बन गया है। झारखंड की जनता जेपीएससी-जेएसएससी विवाद पर सरकार के रुख को बहुत करीब से देख रही है। हिरासत में लिए गए नेताओं का यह लंबा सफर भविष्य के उन आंदोलनों की नींव हो सकता है, जो आने वाले समय में राज्य की राजनीति की दिशा तय करेंगे। वक्त की मांग है कि सत्ता संयम बरते और लोकतंत्र की खिड़कियों को बंद होने से बचाए।
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