मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़: बिना मानकों और बिना पंजीकरण के सड़कों पर दौड़ रहीं दर्जनों निजी एंबुलेंस

खबर सार :-

झांसी में स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा संकट सामने आया है। परिवहन विभाग में दर्ज 142 वाहनों में से महज 9 निजी एंबुलेंस ही स्वास्थ्य विभाग के मानकों पर खरी उतरी हैं। बिना ऑक्सीजन और जरूरी उपकरणों के दौड़ रहीं एंबुलेंसों पर जिला अधिकारी के कड़े निर्देशों के बाद भी जिम्मेदार अफसर सुस्त बैठे हैं।
मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़: बिना मानकों और बिना पंजीकरण के सड़कों पर दौड़ रहीं दर्जनों निजी एंबुलेंस

खबर विस्तार : -

झांसी: उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के सबसे बड़े केंद्र झांसी महानगर और इसके आसपास के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का एक बेहद डरावना चेहरा सामने आया है। बीमार लोगों को समय पर अस्पताल पहुंचाकर उनकी जान बचाने का दावा करने वाली निजी एंबुलेंस गाड़ियां खुद लोगों के लिए जान का जोखिम बनती जा रही हैं। महानगर के भीतर इस समय दर्जनों की संख्या में ऐसी गाड़ियां खुलेआम घूम रही हैं, जो स्वास्थ्य विभाग के तय नियमों को पूरी तरह ताक पर रखकर चलाई जा रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इन वाहनों के पास मरीजों की सुरक्षा से जुड़े बुनियादी इंतजाम तक मौजूद नहीं हैं।

54 एंबुलेंस ऐसी हैं जो बिना किसी वैध पंजीकरण के सड़कों पर बेखौफ दौड़ रही

सरकारी आंकड़ों के जाल को समझें तो इस समय झांसी के परिवहन विभाग (Transport Department) में कुल 142 गाड़ियों का पंजीकरण एंबुलेंस के तौर पर दर्ज है। इनमें से प्रदेश सरकार की तरफ से चलाई जाने वाली 42 सरकारी एंबुलेंस (Government Ambulance) और केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाली 5 एंबुलेंस शामिल हैं। इसके साथ ही विभिन्न सामाजिक और चैरिटेबल ट्रस्ट (Charitable Trust) की ओर से 8 एंबुलेंस गाड़ियों का संचालन किया जा रहा है। संकट की असली जड़ निजी एंबुलेंस का संचालन है। चैरिटेबल और निजी क्षेत्र को मिलाकर जिले में करीब 54 एंबुलेंस गाड़ियां ऐसी हैं, जो स्वास्थ्य विभाग से बिना किसी जांच-परख या बिना किसी वैध पंजीकरण के सड़कों पर बेखौफ दौड़ रही हैं। यह स्थिति सीधे तौर पर एक गंभीर private ambulance service crisis की ओर इशारा करती है।

63 एंबुलेंस  में से सिर्फ 9 गाड़ियां ही स्वास्थ्य विभाग की जांच में पास

नियमों और कायदों की बात करें तो किसी भी निजी वाहन को एंबुलेंस के रूप में सड़क पर उतारने से पहले स्वास्थ्य विभाग से बकायदा अनापत्ति प्रमाण पत्र और पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। इस प्रक्रिया के दौरान डॉक्टर और विशेषज्ञ यह जांचते हैं कि गाड़ी के भीतर पर्याप्त ऑक्सीजन (Oxygen), स्ट्रेचर (Stretcher), प्राथमिक उपचार सामग्री (First Aid Kit) और जीवन रक्षक उपकरण (Life Saving Equipment) मौजूद हैं या नहीं। लेकिन झांसी में इस पूरी कानूनी प्रक्रिया को ठेंगा दिखा दिया गया है। जिले में कुल 63 निजी गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन एंबुलेंस के नाम पर जरूर है, पर इनमें से सिर्फ 9 गाड़ियां ही स्वास्थ्य विभाग की जांच में पास हुई हैं। बाकी की बची हुई गाड़ियों में न तो ऑक्सीजन का कोई ठिकाना है और न ही फर्स्ट एड का सामान उपलब्ध है। इस गंभीर लापरवाही के कारण जिले में private ambulance service crisis लगातार गहराती जा रही है और मरीजों को भगवान भरोसे इधर से उधर ढोया जा रहा है।

स्थानीय प्रशासन भी इस पूरे घालमेल से वाकिफ है। कुछ दिनों पहले ही झांसी के जिला अधिकारी (District Magistrate) गौरांग राठी ने इस अराजकता पर सख्त नाराजगी जताई थी। उन्होंने परिवहन विभाग और स्वास्थ्य महकमे के आला अधिकारियों को साफ निर्देश दिए थे कि फर्जी और अवैध रूप से चल रही सभी एंबुलेंस सेवाओं पर तुरंत ताला लगाया जाए। डीएम ने दोनों विभागों की एक संयुक्त टीम बनाकर बड़े पैमाने पर चेकिंग अभियान (Checking Drive) चलाने का हुक्म दिया था, ताकि बिना कागजात और बिना मेडिकल उपकरणों के चल रही गाड़ियों को सीज किया जा सके और उनके मालिकों पर कानूनी मुकदमा दर्ज हो।

हैरानी की बात यह है कि जिलाधिकारी के इतने कड़े आदेश के बाद भी जमीनी स्तर पर हालात में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है। प्रशासनिक अमला अब भी हाथ पर हाथ धरे बैठा है, जिससे अवैध संचालकों के हौसले बुलंद हैं। इस ढीले रवैये के बीच झांसी में पनपा यह private ambulance service crisis थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस पूरे मामले पर जब झांसी स्वास्थ्य विभाग के नवनियुक्त नोडल अधिकारी (Nodal Officer) डॉक्टर अंशुमान तिवारी से बात की गई, तो उन्होंने बताया कि उन्हें हाल ही में निजी एंबुलेंस के मानकों की जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके अब तक के कार्यकाल में केवल 9 निजी एंबुलेंस संचालकों ने ही विभाग के पास आकर अपनी गाड़ियों की जांच करवाई है और मानकों के आधार पर अपना पंजीकरण पक्का कराया है। विभाग अब अन्य डिफाल्टरों की सूची तैयार कर रहा है। बहरहाल, अफसरों के दावों और कागजी कार्रवाई से अलग जमीनी हकीकत यह है कि जब तक इन बिना फिटनेस और बिना लाइफ सपोर्ट वाली गाड़ियों पर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगती, तब तक झांसी का यह private ambulance service crisis मरीजों की जान के लिए एक बड़ा खतरा बना रहेगा। तीमारदार मजबूरी में मोटी रकम देकर इन डब्बों जैसी गाड़ियों में अपने मरीजों को बैठाने पर मजबूर हैं, जो किसी भी वक्त बड़े हादसे की वजह बन सकती हैं।

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