भीलवाड़ा में चातुर्मास (Bhilwara Chaturmas) का शुभारंभ, आचार्य श्रीरामदयालजी (Acharya Shriramdayalji) के सानिध्य में गूंजी रामधुन
खबर सार :-
भीलवाड़ा में जगद्गुरु आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज के सानिध्य में 'विश्व शांति कल्याण' चातुर्मास का भव्य शुभारंभ। जानिए इस धार्मिक आयोजन की खास बातें और आचार्यश्री के प्रवचन।
खबर विस्तार : -
भीलवाड़ा (Bhilwara): आषाढ़ शुक्ल एकादशी के पावन अवसर पर शनिवार को आध्यात्मिक और वैदिक परंपराओं के बीच 'विश्व शांति कल्याण' चातुर्मास (Chaturmas) का भव्य शुभारंभ हो गया है। अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के पीठाधीश्वर जगद्गुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज (Acharya Shriramdayalji Maharaj) के सानिध्य में आयोजित इस चार महीने लंबे आध्यात्मिक अनुष्ठान से पूरा क्षेत्र राममय हो उठा है। सुबह की मंगल आरती और रामधुनी के साथ शुरू हुए इस आयोजन में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर धर्मलाभ अर्जित किया और संतों के वचनों से जीवन को धन्य बनाया।
चातुर्मास (Chaturmas) और संत परंपरा का महत्व
प्रातःकाल के पावन सत्र में आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने अपने अमृतमय प्रवचनों में चातुर्मास (Chaturmas) के धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा और सम्प्रदाय के संविधान के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी से शुरू होने वाला यह महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, संयम और लोककल्याण का उत्तम मार्ग है।
"जिस व्यक्ति के हृदय में राम का निवास होता है, उसके जीवन से चिंता और भय स्वतः समाप्त हो जाते हैं तथा उसे केवल परम आनंद की प्राप्ति होती है।"
- आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज
चातुर्मास (Chaturmas) के दौरान प्रतिदिन नियम से वाणीजी का पाठ और विशेष सत्संग आयोजित किया जाएगा, जिससे श्रद्धालुओं को सनातन संस्कृति और नैतिक मूल्यों को गहराई से समझने का अवसर मिलेगा।
भीलवाड़ा (Bhilwara) की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता
आचार्यश्री ने अपने संबोधन में भीलवाड़ा (Bhilwara) की पावन भूमि का स्मरण करते हुए बताया कि सन 1817 में सम्प्रदाय के प्रवर्तक स्वामी रामचरणजी महाराज के चरण इस धरती पर पड़े थे। उन्होंने मियाचंदजी तोषनीवाल की बावड़ी पर बैठकर लंबे समय तक साधना और सत्संग किया था। इसके अलावा उन्होंने महान साधिका स्वरूपाबाई की तपस्या का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी साधना का प्रभाव आज भी इस क्षेत्र की फिजाओं में जीवित है और देश-विदेश तक रामभक्ति का संदेश फैला रहा है।
सामाजिक संदेश और प्रतिदिन के कार्यक्रम
धर्म के साथ-साथ आचार्यश्री ने समाज सुधार का संदेश देते हुए कहा कि पुत्र और पुत्री में किसी भी प्रकार का भेद करना घोर अज्ञान है। बेटियां भी परिवार और राष्ट्र का गौरव बढ़ाती हैं। इस अवसर पर संत मनोरथरामजी आलोट और कोटा से पधारे संत प्रीतमरामजी ने भी अपने भजनों और प्रवचनों से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। चातुर्मास (Chaturmas) के आगामी महीनों में प्रतिदिन सुबह नियमित पाठ, प्रवचन और संध्या कालीन महाआरती का आयोजन होगा, जिससे भीलवाड़ा (Bhilwara) की यह धरा चार महीनों तक निरंतर भक्ति रस में डूबी रहेगी।
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