केंद्रीय बजट 2026 से क्या हैं उम्मीदें? रक्षा, खनिज, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर रहेगा फोकस
खबर सार :-
केंद्रीय बजट 2026-27 से बड़े चौंकाने वाले ऐलानों की नहीं, बल्कि रणनीतिक और संतुलित फैसलों की उम्मीद है। रक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे पर बढ़ा हुआ फोकस भारत की दीर्घकालिक विकास जरूरतों को मजबूती देगा। यदि सरकार वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हुए लक्षित निवेश करती है, तो अर्थव्यवस्था और बाजार दोनों को इसका लाभ मिल सकता है।
खबर विस्तार : -
Union Budget 2026-27: केंद्र सरकार में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 01 फरवरी को संसद के समक्ष वर्ष 2026-27 का आम बजट पेश करेंगी। मोदी सरकार की ओर से पेश किया जाने वाला यह बजट कई मायनों में अहम माना जा रहा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव, ऊंचे कर्ज और घरेलू मांग को गति देने की जरूरत के बीच सरकार के सामने संतुलन साधने की चुनौती होगी। मोतीलाल ओसवाल और एसबीआई जैसी प्रमुख वित्तीय संस्थाओं की रिपोर्ट्स इशारा कर रही हैं कि इस बार बजट में बड़े लोकलुभावन ऐलानों के बजाय रणनीतिक क्षेत्रों पर लक्षित और व्यावहारिक फैसले देखने को मिल सकते हैं।
वैश्विक माहौल और बजट की प्राथमिकताएं
दुनिया इस समय आर्थिक बिखराव, युद्धों और सप्लाई चेन के दबाव से गुजर रही है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी हो गया है कि वह विकास की रफ्तार बनाए रखते हुए राजकोषीय अनुशासन से समझौता न करे। मोतीलाल ओसवाल की ‘इंडिया स्ट्रैटेजी’ रिपोर्ट के मुताबिक, नीति निर्माता इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए बजट तैयार कर रहे हैं। निवेशकों की भी अपेक्षाएं सीमित हैं, जिससे अगर सरकार कुछ सकारात्मक और स्पष्ट कदम उठाती है तो बाजार की प्रतिक्रिया बेहतर हो सकती है।

रक्षा क्षेत्र को मिल सकता है बड़ा समर्थन
रिपोर्ट्स के अनुसार, रक्षा क्षेत्र बजट 2026 की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा। बदलते वैश्विक हालात और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के चलते आत्मनिर्भर भारत के तहत रक्षा उत्पादन, आधुनिक हथियार प्रणालियों और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च बढ़ाया जा सकता है। घरेलू रक्षा कंपनियों और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन मिलने से न केवल आयात पर निर्भरता घटेगी, बल्कि रोजगार और तकनीकी क्षमता में भी इजाफा होगा।
महत्वपूर्ण खनिज और ऊर्जा सुरक्षा पर जोर
लिथियम, कोबाल्ट, रेयर अर्थ जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक वाहन, रिन्यूएबल एनर्जी और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के लिए ये खनिज बेहद जरूरी हैं। ऐसे में बजट में इनके घरेलू उत्पादन, अन्वेषण और विदेशों में खनिज संपत्तियों के अधिग्रहण से जुड़ी नीतियों को मजबूती मिल सकती है। साथ ही, ऊर्जा क्षेत्र में कोयला, गैस, सोलर और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी परियोजनाओं पर पूंजीगत निवेश बढ़ने की संभावना है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा
भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर अहम भूमिका निभा रहा है। बजट में प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाओं के विस्तार, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग और वैल्यू चेन को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त प्रावधान किए जा सकते हैं। इससे निर्यात बढ़ेगा और भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार होगा।
बुनियादी ढांचे पर कैपेक्स बढ़ाने की तैयारी
एसबीआई (SBI) की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर 12 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा कर सकती है, जो पिछले साल की तुलना में करीब 10 प्रतिशत अधिक होगा। यह बढ़ा हुआ खर्च हाईवे, रेलवे, बंदरगाह, शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर और बिजली परियोजनाओं में लगाया जा सकता है। इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर देने से अर्थव्यवस्था को मल्टीप्लायर इफेक्ट मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
राजकोषीय घाटा और वित्तीय अनुशासन
कोविड के दौरान जहां राजकोषीय घाटा 9.2 प्रतिशत तक पहुंच गया था, वहीं अब इसके वित्त वर्ष 2026 के अंत तक 4.4 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2027 में करीब 4.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है। सरकार खर्च पर नियंत्रण बनाए रखने के संकेत दे रही है। हालांकि, अगर अतिरिक्त खर्च उत्पादक क्षेत्रों या खपत बढ़ाने की दिशा में होता है, तो बाजार इसका सकारात्मक स्वागत कर सकता है।
मध्यम वर्ग और खपत से जुड़ी उम्मीदें
पिछले बजट में आयकर में दी गई राहत का पूरा असर अभी अर्थव्यवस्था में दिखना बाकी है। इसलिए रिपोर्ट्स का मानना है कि इस बार मध्यम वर्ग को लेकर बड़े ऐलान की संभावना कम है। सरकार सीमित और लक्षित उपायों के जरिए खपत को सहारा देने की कोशिश कर सकती है, लेकिन फोकस मुख्य रूप से पूंजी निवेश पर ही रहेगा।

कर राजस्व, उधारी और आरबीआई की भूमिका
एसबीआई के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 में कर राजस्व में मामूली बढ़ोतरी हो सकती है, जबकि गैर-कर राजस्व स्थिर रह सकता है। केंद्र सरकार की शुद्ध उधारी करीब 11.7 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। राज्य सरकारों की उधारी भी बड़ी रहेगी। इन जरूरतों को संतुलित करने के लिए आरबीआई को ओपन मार्केट ऑपरेशन बढ़ाने पड़ सकते हैं।
कर सुधार और वित्तीय बचत बढ़ाने के सुझाव
रिपोर्ट्स में बैंक जमा पर ब्याज कर व्यवस्था, टैक्स सेविंग एफडी की लॉक-इन अवधि और टीडीएस सीमा में बदलाव जैसे सुझाव दिए गए हैं। अप्रत्यक्ष करों में जीएसटी से जुड़े कुछ प्रावधानों को सरल बनाने की सिफारिश भी की गई है। इसके अलावा बीमा और पेंशन सेक्टर में सुधारों के जरिए वित्तीय समावेशन बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
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