Sabarimala Case Supreme Court Hearing : सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी याचिका की वैधता पर उठाए गंभीर सवाल, कहा- प्रक्रिया सही नहीं
खबर सार :-
Sabarimala Case Supreme Court Hearing : सबरीमाला मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने 1962 के दाऊदी बोहरा फैसले को चुनौती देने के तरीके पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 32 के बजाय पुनर्विचार याचिका सही मार्ग है। जानें पूरी रिपोर्ट।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली: सबरीमाला मंदिर और धार्मिक प्रथाओं से जुड़े पेचीदा कानूनी मामले में उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सुनवाई के 12वें दिन याचिकाकर्ताओं के कानूनी मार्ग पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि दशकों पुराने फैसले को चुनौती देने के लिए अपनाया गया तरीका कानून सम्मत प्रतीत नहीं होता।
Sabarimala Case Supreme Court Hearing : पुनर्विचार याचिका के बजाय अनुच्छेद 32 का सहारा क्यों?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने विशेष रूप से 1962 के उस फैसले का जिक्र किया, जिसमें दाऊदी बोहरा समुदाय की 'बहिष्कार' (Excommunication) परंपरा को सही ठहराया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी पुराने संवैधानिक फैसले को चुनौती देनी थी, तो उसके लिए पुनर्विचार (Review) या क्यूरेटिव याचिका दायर की जानी चाहिए थी। सीधे अनुच्छेद 32 के तहत नई याचिका दाखिल करना कानूनी रूप से उचित नहीं है। सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने याचिकाकर्ताओं से कड़ा सवाल पूछते हुए कहा, "हम यह समझना चाहते हैं कि इस मामले को अनुच्छेद 32 के तहत क्यों सुना जाए?"
Sabarimala Case Supreme Court Hearing : संस्थाओं की 'आस्था' पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
इससे पहले, कोर्ट ने याचिकाकर्ता 'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन' को भी आड़े हाथों लिया। जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि आस्था और अंतरात्मा का अधिकार केवल व्यक्तियों के पास होता है, किसी कानूनी संस्था (Body Corporate) के पास नहीं। कोर्ट ने संस्था से पूछा कि क्या वे देश के 'मुख्य पुजारी' हैं जो इस तरह की याचिका लेकर आए हैं? जस्टिस अरविंद कुमार ने याचिका दाखिल करने की प्रक्रिया और संगठन के आंतरिक प्रस्तावों पर भी सवाल उठाए।
Sabarimala Case Supreme Court Hearing : गरिमा बनाम परंपरा की जंग
सुधारवादियों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि समुदाय से निष्कासित करना मानवीय गरिमा का हनन है। हालांकि, कोर्ट ने प्रक्रियात्मक त्रुटियों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। शीर्ष अदालत ने यह भी दोहराया कि धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अर्थ 'अराजकता' नहीं है; उनके संचालन के लिए एक ठोस कानूनी ढांचा होना अनिवार्य है।
उल्लेखनीय है कि 2018 के ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने 4-1 के बहुमत से महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देते हुए कहा था कि जैविक कारणों से किसी की धार्मिक स्वतंत्रता को छीना नहीं जा सकता। वर्तमान सुनवाई उसी के बाद उपजे व्यापक कानूनी और संवैधानिक सवालों पर केंद्रित है।
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