लिंग परीक्षण से जुड़े मामलों में अब डॉक्टर सीधे नहीं फसेंगे! सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से पुलिस के हाथ हुए पूरी तरह बंधे

खबर सार :-

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पुलिस भ्रूण लिंग परीक्षण मामलों में सीधे एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती। जानिए क्या हैं इसके कानूनी मायने।
लिंग परीक्षण से जुड़े मामलों में  सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पुलिस नहीं दर्ज कर सकेगी FIR

खबर विस्तार : -

New Delhi : हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने देश की न्याय व्यवस्था और चिकित्सा जगत से जुड़ा एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कन्या भ्रूण हत्या और लिंग परीक्षण से जुड़े मामलों (पीसीपीएनडीटी एक्ट) में पुलिस सीधे तौर पर अपनी मर्जी से प्राथमिकी यानी एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती है। इस नए न्यायिक दृष्टिकोण से स्पष्ट होता है कि अब इस संवेदनशील और तकनीकी कानून के तहत केवल अधिकृत अधिकारियों को ही कार्रवाई का विशेष अधिकार प्राप्त होगा।

नया एंगल और कानूनी पेचीदगियां

पारंपरिक रूप से किसी भी गैरकानूनी गतिविधि की सूचना मिलने पर पुलिस तुरंत मामला दर्ज कर अपनी जांच शुरू कर देती है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने साफ किया कि लिंग परीक्षण से जुड़े कानून की प्रकृति बेहद तकनीकी और चिकित्सीय होती है। इसमें सामान्य पुलिसिया जांच के बजाय विशेषज्ञों की संवेदनशीलता और सटीक मेडिकल ज्ञान की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि कानून ने पुलिस को प्राथमिक जांच एजेंसी के रूप में स्वीकार नहीं किया है, हालांकि विशेष परिस्थितियों में उपयुक्त प्राधिकारी की मांग पर पुलिस केवल एक सहायक की भूमिका निभा सकती है।

क्या था पूरा मामला?

इस कानूनी बहस की नींव साल 2017 में उत्तर प्रदेश के एक चिकित्सक के खिलाफ उठी थी। उस डॉक्टर पर अवैध तरीके से भ्रूण का लिंग परीक्षण करने और कन्या भ्रूण रोकने में मदद करने के गंभीर आरोप लगे थे। स्थानीय पुलिस ने इस मामले में तुरंत एफआईआर दर्ज कर ली थी।

इसके खिलाफ डॉक्टर ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उनका तर्क था कि पीसीपीएनडीटी अधिनियम की धारा 28 के तहत केवल एक अधिकृत प्राधिकरण या उचित अधिकारी को ही अदालत में शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है, न कि पुलिस को सीधे एफआईआर दर्ज करने का। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसमें पुलिस के सीधे एफआईआर दर्ज करने के अधिकार को खारिज किया गया था। इस नए निर्णय से अब चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों को कानूनी उत्पीड़न से राहत मिलने की उम्मीद है, साथ ही कानून के सही प्रावधानों का पालन करना अनिवार्य हो गया है।

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