नई दिल्ली : पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर (Manipur) में पिछले लंबे समय से जारी अशांति और हिंसक दौर को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने अब तक का सबसे कड़ा रुख अख्तियार किया है। उच्चतम न्यायालय ने राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति और हिंसा से जुड़े तमाम मुकदमों की कछुआ चाल पर सख्त नाराजगी जताई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (Chief Justice Suryakant) की अगुवाई वाली विशेष पीठ ने इस पूरे मामले की कमान अपने हाथों में लेते हुए जांच प्रक्रिया को युद्ध स्तर पर तेज करने का फरमान जारी किया है। इसके साथ ही, न्यायालय ने विशेष जांच दल (SIT) को तुरंत प्रभाव से एक नई और विस्तृत स्थिति रिपोर्ट (status report) दाखिल करने का अल्टीमेटम दिया है, जिससे गुनहगारों में हड़कंप मच गया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की गहराई से समीक्षा करते हुए स्पेशल जांच दल (SIT) की पुरानी रिपोर्ट के पन्नों को पलटा। इस दौरान यह तथ्य सामने आया कि जांच एजेंसियों ने अब तक कुल 207 आपराधिक मुकदमों में 400 से अधिक आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र (charge sheet) यानी चार्जशीट कोर्ट में पेश कर दी है। हालांकि, अदालत इस बात से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखी कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी पीड़ितों को समय पर न्याय क्यों नहीं मिल पा रहा है। मुख्य न्यायाधीश ने साफ शब्दों में कहा कि मामलों को लटकाए रखने का दौर अब बंद होना चाहिए और सुनवाई में ऐसी तेजी लाई जाए जिससे समाज में एक कड़ा संदेश जाए।
अदालत ने सुनवाई के दौरान एक बेहद महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सुझाव दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में बैठकर जमीनी हकीकत की लगातार सीधे निगरानी करना व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण है। चूंकि अब मणिपुर उच्च न्यायालय (Manipur High Court) में नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति हो चुकी है, इसलिए वे स्थानीय जमीनी परिस्थितियों, सुरक्षा व्यवस्था और भौगोलिक चुनौतियों को दिल्ली के मुकाबले कहीं अधिक बेहतर ढंग से समझ और संभाल सकते हैं। न्यायालय ने संकेत दिया कि अब इन सभी मामलों की कड़े तरीके से रोजाना निगरानी का जिम्मा मणिपुर या गुवाहाटी उच्च न्यायालय (Guwahati High Court) को पूरी तरह सौंप दिया जाना चाहिए ताकि त्वरित अदालती कार्रवाई (speedy trial) सुनिश्चित हो सके।
न्यायालय का ध्यान सिर्फ अपराधियों को सजा दिलाने पर ही नहीं, बल्कि हिंसा की आग में झुलस चुके मासूम लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने पर भी है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को सख्त लहजे में निर्देश दिया है कि पीड़ितों के कल्याण और उनके पुनर्वास (rehabilitation) के लिए गठित की गई जस्टिस गीता मित्तल कमेटी (Justice Gita Mittal Committee) की तमाम सिफारिशों को बिना किसी देरी के फौरन लागू किया जाए।
आपको बता दें कि पीड़ितों की सुध लेने और उन्हें दोबारा समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शीर्ष अदालत ने तीन पूर्व महिला जजों की एक बेहद उच्च स्तरीय कमेटी बनाई थी। इस कमेटी की कमान पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गीता मित्तल के हाथों में है, जबकि उनके साथ जस्टिस शालिनी जोशी (Justice Shalini Joshi) और जस्टिस आशा मेनन (Justice Asha Menon) भी शामिल हैं। यह कमेटी लगातार राहत शिविरों का दौरा कर पीड़ितों की मदद की योजनाएं तैयार कर रही है। इसके साथ ही, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई (CBI) की जांच पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी रहे, इसके लिए देश के बेहद ईमानदार पूर्व आईपीएस अधिकारी दत्तात्रेय पद्सालगिकर (Dattatray Padsalgikar) को निगरानी का जिम्मा सौंपा गया है, जो पल-पल की रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं।
मणिपुर में हिंसा (violence) की यह दर्दनाक दास्तान मई 2023 में शुरू हुई थी, जिसने देखते ही देखते पूरे राज्य को अपनी चपेट में ले लिया। इस भीषण जातीय संघर्ष में अब तक 200 से अधिक मासूम लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि हजारों की तादाद में परिवार बेघर होकर राहत शिविरों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। घायलों की संख्या का तो कोई सटीक आंकड़ा ही नहीं है। गौरतलब है कि इस तबाही की शुरुआत तब हुई थी, जब बहुसंख्यक मैतेई समुदाय (Meitei community) को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग के विरोध में पहाड़ी जिलों में एक विशाल प्रदर्शन का आयोजन किया गया था। इस प्रदर्शन के बाद भड़की चिंगारी ने पूरे राज्य को नफरत की आग में झुलसा दिया, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट ने अपना सबसे हंटर चलाया है।
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