मकोका मामला: पूर्व विधायक नरेश बाल्यान की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से मांगा जवाब
खबर सार :-
महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (मकोका) के तहत दर्ज मामले में घिरे दिल्ली के पूर्व विधायक नरेश बाल्यान को राहत मिलेगी या नहीं, इस पर अब शीर्ष अदालत सुनवाई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने बाल्यान की जमानत अर्जी पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर उसका पक्ष मांगा है।
खबर विस्तार : -
New Delhi : महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून यानी मकोका के तहत दर्ज आपराधिक मामले में जेल में बंद दिल्ली के पूर्व विधायक नरेश बाल्यान की जमानत याचिका पर देश की शीर्ष अदालत ने अपना रुख स्पष्ट किया है। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस को कारण बताओ नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूर्व विधायक की उस अर्जी पर यह आदेश जारी किया, जिसमें उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा जमानत खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी है।
सुप्रीम कोर्ट का यह नोटिस दिल्ली पुलिस के उस कानूनी तंत्र को जवाब देने का अवसर देता है जिसके आधार पर बाल्यान की कस्टडी जारी रखी गई है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस महीने की शुरुआत में, यानी 3 अगस्त को नरेश बाल्यान की नियमित जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उनके खिलाफ मकोका के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। उच्च न्यायालय के इसी आदेश को आधार बनाते हुए बाल्यान ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है, जहां से अब दिल्ली पुलिस को जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है।
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मकोका के प्रावधानों पर दोनों पक्षों में तीखी बहस
उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान नरेश बाल्यान के बचाव पक्ष और दिल्ली पुलिस के अभियोजन पक्ष के बीच मकोका की धाराओं को लागू करने की वैधानिकता पर विस्तृत बहस हुई थी। पूर्व विधायक का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता विवेक जैन ने अदालत के समक्ष तर्क रखा था कि उनके मुवक्किल के खिलाफ मकोका की सख्त धाराएं नहीं लगाई जा सकतीं। बचाव पक्ष का मुख्य आधार यह था कि मकोका कानून को लागू करने के लिए किसी व्यक्ति द्वारा संगठित रूप से 'निरंतर अपराध' (कंटीन्यूइंग क्राइम) में शामिल होने का ठोस प्रमाण होना आवश्यक है। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि दर्ज प्राथमिकी में ऐसी किसी नई आपराधिक गतिविधि या ताजा अपराध का उल्लेख नहीं है, जिससे निरंतरता सिद्ध होती हो।
इसके विपरीत, दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए विशेष सार्वजनिक अभियोजक अमित प्रसाद ने मकोका के वैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए याचिका का कड़ा विरोध किया था। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि यदि कोई व्यक्ति किसी भी रूप में किसी संगठित आपराधिक गिरोह की मदद करता है या उसके साथ साठगांठ में शामिल पाया जाता है, तो वह मकोका के दायरे में आता है। सरकारी वकील ने आरोप पत्र के आधार पर स्पष्ट किया था कि जांच एजेंसी ने केवल किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत भूमिका को नहीं, बल्कि पूरे गिरोह की संगठित कार्यशैली और साठगांठ को रेखांकित किया है।
गवाह की हत्या और साठगांठ का मामला
जांच एजेंसी ने सुनवाई के दौरान वर्ष 2019 के एक पुराने मामले का विशेष रूप से उल्लेख किया था। दिल्ली पुलिस का दावा है कि 2019 की प्राथमिकी से संबंधित आपराधिक साठगांठ की परतें वर्ष 2024 में हुई जांच के दौरान खुलीं। अभियोजन पक्ष ने अदालत को अवगत कराया कि 2019 के उस मामले में जो व्यक्ति मुख्य चश्मदीद गवाह था, उसकी वर्ष 2024 में हत्या कर दी गई थी। पुलिस के अनुसार, गवाह की यह हत्या आरोपित और संगठित गिरोह के बीच की गहरी सांठगांठ और आपराधिक गतिविधि की निरंतरता को दर्शाती है, जो मकोका लागू करने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करती है।
इस आपराधिक मामले में निचली अदालत के स्तर पर भी कानूनी प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी है। दिल्ली पुलिस द्वारा नरेश बाल्यान सहित पांच आरोपियों के खिलाफ दायर की गई पूरक चार्जशीट (पूरक आरोप पत्र) पर राऊज एवेन्यू कोर्ट ने 5 मई 2025 को औपचारिक रूप से संज्ञान लिया था। इस पूरक चार्जशीट में ही मकोका की धाराओं और आरोपियों की भूमिका के संबंध में विस्तृत साक्ष्य शामिल किए गए हैं, जिसके आधार पर मामले का ट्रायल प्रस्तावित है।
गिरफ्तारी का घटनाक्रम और कानूनी पृष्ठभूमि
इस पूरे कानूनी मामले का घटनाक्रम काफी उलझाव भरा रहा है। दिल्ली पुलिस ने शुरुआत में नरेश बाल्यान को कथित जबरन वसूली (एक्सटॉर्शन) से जुड़े एक मामले में 30 नवंबर 2024 की देर रात गिरफ्तार किया था। इस मामले में कानूनी प्रक्रिया के तहत पूर्व विधायक को राहत मिल गई थी और अदालत ने 4 दिसंबर 2024 को उन्हें वसूली वाले केस में जमानत दे दी थी।
हालांकि, 4 दिसंबर को जैसे ही वसूली मामले में जमानत का आदेश आया, दिल्ली पुलिस की संगठित अपराध शाखा ने तुरंत कार्रवाई करते हुए बाल्यान को मकोका के तहत दर्ज नए मामले में गिरफ्तार कर लिया। तब से पूर्व विधायक न्यायिक हिरासत में हैं और निचली अदालत से लेकर अब सुप्रीम कोर्ट तक अपनी जमानत के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
नरेश बाल्यान पर दर्ज यह मामला मुख्य रूप से जबरन वसूली और संगठित अपराध गिरोहों के साथ संदिग्ध संबंधों से जुड़ा हुआ है। दिल्ली पुलिस का आरोप है कि पूर्व विधायक ने गिरोह के सदस्यों की मदद से व्यावसायिक लाभ और अन्य गतिविधियों के लिए नेटवर्क का इस्तेमाल किया। वहीं बचाव पक्ष लगातार इन दावों को खारिज करते हुए इसे कानूनी रूप से अनुचित मकोका का प्रयोग करार दे रहा है। मकोका एक अत्यंत कठोर कानून है, जिसमें जमानत मिलना सामान्य आपराधिक कानूनों की तुलना में बेहद कठिन होता है। यही कारण है कि उच्च न्यायालय से याचिका खारिज होने के बाद मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत के विचाराधीन है, जहां पुलिस का जवाब आने के बाद आगे की सुनवाई की दिशा तय होगी।
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