प्रधानमंत्री की पोस्ट फेसबुक से हटने पर संसदीय पैनल का कड़ा रुख, मेटा से 10 दिनों में मांगी पूरी रिपोर्ट
खबर सार :-
संसदीय स्थायी समिति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फेसबुक पोस्ट को हटाए जाने पर असंतोष व्यक्त किया है। समिति ने इसे तकनीकी खामी मानने से इनकार कर मेटा से स्पष्टीकरण मांगा है।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली : संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) से जुड़ी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधिकारिक फेसबुक पोस्ट के अस्थायी रूप से गायब होने पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। सोमवार को आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक में समिति ने वैश्विक सोशल मीडिया मंचों की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और उनकी नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए।
दिग्गज टेक कंपनियों और मंत्रालयों के प्रतिनिधियों की पेशी
भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता में हुई इस बैठक का मुख्य विषय 'सोशल और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का नियमन' था। इसमें मेटा, गूगल, यूट्यूब, एक्स और स्नैपचैट के प्रतिनिधियों के अलावा केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। बैठक के दौरान समिति के अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि देश के प्रधानमंत्री के आधिकारिक संचार का इस तरह अचानक हट जाना एक संवेदनशील विषय है। इसे केवल एक सामान्य तकनीकी त्रुटि मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। पैनल ने मेटा से इस बात की विस्तृत जानकारी मांगी है कि पोस्ट हटने का मुख्य कारण क्या था, वह कितने समय तक प्लेटफॉर्म से गायब रही और क्या इसे किसी स्वचालित प्रणाली या मानवीय हस्तक्षेप के जरिए हटाया गया था।
ऑडिट ट्रेल की मांग
संसदीय समिति ने मेटा को निर्देश दिया है कि वह सामग्री की रिपोर्टिंग से लेकर उसकी पुनः बहाली तक का पूरा 'ऑडिट ट्रेल' प्रस्तुत करे। पैनल का मानना है कि यदि देश के सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर बैठे व्यक्ति का संदेश सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिकों के खातों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा होता है।
कंटेंट मॉडरेशन नीतियों की निष्पक्षता पर उठे सवाल
पैनल ने कंपनियों की सामग्री समीक्षा नीतियों की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। समिति का कहना था कि बिना किसी स्पष्ट कारण के पोस्ट हटाना, खातों पर प्रतिबंध लगाना और भारत-समर्थक तथा सरकार-समर्थक पेजों की पहुंच को सीमित करना चिंता का विषय है। समिति ने पूछा कि क्या उत्पीड़न, अभद्र भाषा और बदमाशी से जुड़ी नीतियों को बिना किसी पूर्वाग्रह के समान रूप से लागू किया जा रहा है।
मंत्रालयों से राय और 10 दिनों की समयसीमा
बैठक में उपस्थित प्रशासनिक मंत्रालयों से पूछा गया कि क्या डिजिटल मध्यस्थों को नियंत्रित करने वाले वर्तमान भारतीय कानून पर्याप्त हैं या इसमें और अधिक कड़े विधायी बदलावों की आवश्यकता है। समिति ने मंत्रालयों और डिजिटल कंपनियों को अपने उत्तर 10 दिनों के भीतर लिखित रूप में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है, ताकि डिजिटल मंचों के सुचारू संचालन पर एक व्यापक रिपोर्ट तैयार की जा सके। मामले के अतिरिक्त, समिति ने देश में लगातार बढ़ रहे वित्तीय साइबर अपराधों के आंकड़ों पर भी विचार-विमर्श किया। बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में साइबर अपराध से संबंधित लगभग 28.15 लाख शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें नागरिकों को करीब 22,495 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ।
डीपफेक और ऑनलाइन सुरक्षा पर सख्त कदम की मांग
संबंधित चर्चा के दौरान एआई-जनित भ्रामक जानकारियों, डीपफेक तकनीक के दुरुपयोग, फर्जी निवेश योजनाओं और सोशल मीडिया पर बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक विज्ञापनों के प्रसार पर भी गहरी चिंता व्यक्त की गई। समिति ने स्पष्ट किया कि डिजिटल माध्यमों पर पारदर्शिता, जवाबदेही और उपयोगकर्ताओं का विश्वास बहाल करना वर्तमान समय की प्राथमिक आवश्यकता है। संसदीय स्थायी समिति लंबे समय से भारत में कार्यरत विदेशी टेक कंपनियों के नियमन और उनके भारतीय कानूनों के अनुपालन की समीक्षा कर रही है। इससे पहले भी आईटी मंत्रालय द्वारा सोशल मीडिया कंपनियों के लिए 'मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता' लागू की गई थी। इसके तहत कंपनियों को भारत में निवासी शिकायत अधिकारी नियुक्त करने और मासिक अनुपालन रिपोर्ट जारी करने का प्रावधान किया गया है। ताजा घटनाक्रम के बाद देश में डिजिटल इंटरमीडियरीज के लिए कानूनी ढांचे को और अधिक सख्त बनाने की मांग को बल मिला है।
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