कलकत्ता हाई कोर्ट से ऋतब्रत बनर्जी को झटका, तृणमूल के बैंक खाते फ्रीज मामले में याचिका खारिज
खबर सार :-
कलकत्ता हाई कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस के बैंक खाते फ्रीज करने के मामले में ऋतब्रत बनर्जी की पक्षकार बनने की याचिका खारिज कर दी है। जानिए अदालत में ईडी और अभिषेक मनु सिंघवी के बीच क्या बहस हुई।
खबर विस्तार : -
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) के विभिन्न बैंक खातों को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा फ्रीज (Freeze) किए जाने के विवाद में सोमवार को कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) में एक अहम मोड़ आया। अदालत ने विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी की उस अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने इस पूरे कानूनी मामले में एक पक्षकार (Party) के रूप में शामिल होने की अनुमति मांगी थी। मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने स्पष्ट किया कि तृणमूल कांग्रेस के वास्तविक नेतृत्व और उसके वैध प्रतिनिधित्व का मामला वर्तमान में भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के समक्ष लंबित है। ऐसे में अदालत इस समय राजनीतिक दल के आंतरिक विवाद या प्रतिनिधित्व से जुड़े मामले में किसी भी तरह का दखल देने के पक्ष में नहीं है।
याचिका की वैधता पर ही गंभीर सवाल खड़े किए गए
इस पूरी कानूनी बहस के दौरान केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने मूल याचिका की वैधता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने दलील दी कि पार्टी की तरफ से राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन को इस याचिका पर हस्ताक्षर करने के लिए राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (National Executive Committee) द्वारा आधिकारिक रूप से अधिकृत ही नहीं किया गया था। केंद्रीय एजेंसी का कहना था कि बिना किसी ठोस और उचित कानूनी अधिकार के दायर की गई इस अर्जी पर अदालत को सुनवाई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इसमें वास्तविक तथ्यों को छिपाने की कोशिश की गई है।
वित्तीय या प्रशासनिक तथ्यों को छिपाने जैसी बातें निराधार
दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस का पक्ष रख रहे देश के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने ईडी के इन दावों का पुरजोर विरोध किया। सिंघवी ने अदालत को याद दिलाया कि इसी महीने की नौ तारीख को हाई कोर्ट इस पूरे विषय पर एक अंतरिम आदेश जारी कर चुका है, इसलिए वित्तीय या प्रशासनिक तथ्यों को छिपाने जैसी बातें पूरी तरह से निराधार और तर्कहीन हैं। उन्होंने अदालत के समक्ष आंकड़े रखते हुए बताया कि जांच एजेंसी ने शुरुआत में तीन और अब तक कुल आठ बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है। सिंघवी ने दलील दी कि इन खातों से बीते चार मई से पहले चुनाव संबंधी खर्च किए गए थे और उस दौरान किसी भी स्तर पर कोई आपत्ति नहीं दर्ज कराई गई थी। लेकिन बाद में 18 जून को मिली एक शिकायत को आधार बनाकर अगले ही दिन 19 जून को खाते सीज कर दिए गए और इसके बाद सात जुलाई को दोबारा वैसी ही कार्रवाई की गई।
अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में दलील दी कि बैंक खातों को पूरी तरह से ब्लॉक करके किसी भी लोकतांत्रिक राजनीतिक दल की सामान्य और रोजमर्रा की राजनीतिक गतिविधियों को जबरन ठप नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसी परिपाटी बनती जा रही है जहां पहले किसी संगठन को आर्थिक रूप से लाचार कर दिया जाता है और फिर उसे अदालत का दरवाजा खटखटाने की सलाह दी जाती है, जो कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है।
सभी बैंक खातों को तुरंत बहाल करने की मांग
तृणमूल कांग्रेस की तरफ से पैरवी कर रहे एक अन्य वरिष्ठ वकील किशोर दत्त ने अदालत को बताया कि करीब 440 करोड़ रुपये के विमान और हेलीकॉप्टर की खरीद-फरोख्त से जुड़े आरोपों को ढाल बनाकर यह पूरी कार्रवाई की गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रवर्तन निदेशालय इस मामले में एक वित्तीय जांच एजेंसी के बजाय पुलिस की तरह व्यवहार कर रहा है। इस बिंदु पर न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने सवाल किया कि यदि पार्टी को कुछ चुनिंदा बैंक खातों के संचालन की अनुमति मिली हुई है, तो आखिर काम करने में क्या परेशानी आ रही है? इसके जवाब में वकील किशोर दत्त ने अदालत से इस मामले में दर्ज प्रवर्तन मामले के सूचना पत्र यानी ईसीआईआर (ECIR) को पूरी तरह से रद्द करने और दल के सभी बैंक खातों को तुरंत बहाल करने की मांग की।
इसी सुनवाई के दौरान ऋतब्रत बनर्जी के वकील जिष्णु चौधरी ने अपने मुवक्किल को मामले का हिस्सा बनाने का आग्रह दोहराया, जिसे पीठ ने स्वीकार करने से मना कर दिया। सुनवाई के अंतिम चरण में न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने केंद्रीय एजेंसी से पूछा कि क्या उनकी यह पूरी तफ्तीश स्थानीय पुलिस की एफआईआर (FIR) पर टिकी है? इस पर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल धीरज त्रिवेदी ने स्थिति साफ करते हुए कहा कि यदि पुलिस की प्राथमिक शिकायत में मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) यानी अवैध धनशोधन से जुड़े पुख्ता और महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं, तो ईडी को इस कानून के तहत पूरी तरह से स्वतंत्र जांच शुरू करने का वैधानिक अधिकार है।
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