नई दिल्ली : भारतीय राजनीति के फलक पर 'ईमानदारी की राजनीति' का नारा बुलंद कर उभरी आम आदमी पार्टी (AAP) आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कोख से जन्मी यह पार्टी, जिसने दिल्ली और पंजाब की सत्ता पर काबिज होकर पारंपरिक दलों की नींद उड़ा दी थी, अब खुद 'अस्तित्व के संकट' और 'आंतरिक बिखराव' से जूझ रही है। शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 की तारीख भारतीय संसदीय इतिहास में एक बड़े राजनीतिक उलटफेर के तौर पर दर्ज हो गई, जब AAP के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने एक साथ पार्टी को 'अलविदा' कह दिया।
इस घटनाक्रम ने न केवल दिल्ली और पंजाब की सियासत में भूचाल ला दिया है, बल्कि दल-बदल विरोधी कानून और संसदीय मर्यादाओं पर एक नई बहस छेड़ दी है।
इस पूरे सियासी ड्रामे के केंद्र में हैं राघव चड्ढा। कभी अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार माने जाने वाले चड्ढा ने अब भगवा चोला ओढ़ लिया है। राघव चड्ढा के साथ संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने आधिकारिक तौर पर भाजपा का दामन थाम लिया है। चड्ढा का तर्क पूरी तरह से संवैधानिक ढाल के पीछे छिपा है। उन्होंने दावा किया कि संविधान के अनुसार, यदि किसी पार्टी के कुल सांसदों में से दो-तिहाई सदस्य एक साथ किसी दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं, तो उन पर दल-बदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) के तहत अयोग्यता की तलवार नहीं लटकती।
कुल सांसद: 10
दलबदल करने वाले: 7 (राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी)
गणित: 10 का दो-तिहाई हिस्सा लगभग 6.66 होता है, यानी 7 सांसदों का साथ आना तकनीकी रूप से उन्हें अयोग्यता से बचा सकता है।
AAP का पलटवार: 'तीन के खिलाफ कार्रवाई, चार पर सस्पेंस'
आम आदमी पार्टी ने इसे लोकतंत्र की हत्या और भाजपा का 'ऑपरेशन लोटस' करार दिया है। हालांकि, पार्टी की कानूनी रणनीति काफी सोची-समझी दिख रही है। AAP के राज्यसभा व्हिप एनडी गुप्ता और वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने स्पष्ट किया है कि वे फिलहाल केवल तीन सांसदों-राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल-के खिलाफ अयोग्यता की याचिका दायर करेंगे।
इसका कारण यह है कि इन तीनों ने सार्वजनिक रूप से भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। वहीं, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी ने अभी तक औपचारिक रूप से भाजपा के मंच पर सदस्यता नहीं ली है, हालांकि भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने सोशल मीडिया पर उन्हें शुभकामनाएं देकर मंशा साफ कर दी है। संजय सिंह का कहना है, "यह पंजाब के जनादेश और जनता के विश्वास के साथ गद्दारी है। भाजपा केंद्रीय एजेंसियों का डर दिखाकर डराने की कोशिश कर रही है, लेकिन लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च है।"
पार्टी छोड़ने वाले सात चेहरों में सबसे चौंकाने वाला नाम स्वाति मालीवाल का है। दिल्ली महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष और मुखर नेता मालीवाल ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक भावुक पोस्ट साझा किया। उन्होंने लिखा कि वे फिलहाल संसदीय समिति की बैठक के लिए ईटानगर में हैं, लेकिन उन्होंने पार्टी छोड़ने के फैसले की पुष्टि कर दी है। उन्होंने अपने 2006 के संघर्ष और अन्ना आंदोलन के दिनों को याद करते हुए संकेत दिया कि वे जल्द ही विस्तार से अपनी बात रखेंगी। उनके इस रुख से साफ है कि AAP के भीतर दरार काफी गहरी हो चुकी थी।
इस पूरे मामले में असली लड़ाई अब राज्यसभा सभापति के दफ्तर में लड़ी जाएगी। 1985 में लाया गया 'दल-बदल विरोधी कानून' (Anti-Defection Law) स्पष्ट कहता है कि यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है, तो वह सदन की सदस्यता खो देगा। लेकिन, कानून का खंड 4 एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है। यदि किसी दल के दो-तिहाई सदस्य मूल दल से अलग होकर किसी अन्य दल में विलय (Merger) करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
AAP का तर्क है कि चूंकि अभी केवल तीन लोगों ने आधिकारिक सदस्यता ली है, इसलिए वे 'दो-तिहाई' के कोटे में नहीं आते और उनकी सदस्यता जानी चाहिए। वहीं, राघव चड्ढा का खेमा सात सांसदों के हस्ताक्षर वाला पत्र दिखाकर खुद को सुरक्षित मान रहा है। क्या इन सात सांसदों का भाजपा में विलय एक साथ माना जाएगा या अलग-अलग? यही वह बारीक कानूनी बिंदु है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय तक बात जा सकती है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा सांसदों का स्वागत करना यह संकेत देता है कि पार्टी अब पंजाब में अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए तैयार है। राज्यसभा में झटके के बाद अब खतरा पंजाब की भगवंत मान सरकार पर भी मंडरा सकता है। संजय सिंह ने पहले ही आशंका जताई है कि यह पंजाब सरकार को अस्थिर करने की साजिश है। यदि राज्यसभा के सांसद पाला बदल सकते हैं, तो विधानसभा में विधायकों की निष्ठा बनाए रखना AAP के लिए बड़ी चुनौती होगी।
आम आदमी पार्टी के लिए यह केवल संख्याबल का नुकसान नहीं है, बल्कि यह एक 'नैतिक पराजय' जैसी स्थिति है। जो पार्टी 'सिस्टम बदलने' आई थी, आज वह उसी सिस्टम के पुराने खेल का शिकार होती दिख रही है। राघव चड्ढा का दांव अगर सफल रहता है, तो यह AAP के लिए राज्यसभा में भारी नुकसान होगा। और अगर सदस्यता रद्द होती है, तो यह भाजपा के लिए एक अस्थायी झटका होगा लेकिन AAP के लिए 'शहीद कार्ड' खेलने का मौका।
आने वाले दिन भारतीय राजनीति के लिए निर्णायक होंगे। क्या संविधान का अनुच्छेद 10 इस दलबदल को मान्यता देगा या 'नैतिकता' के आधार पर कोई नया उदाहरण पेश होगा? नजरें अब राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन के फैसले पर टिकी हैं।
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