वाराणसी: जब चित्र बने प्रतिरोध की आवाज और माचिस की डिबिया बनी भारत की कहानी, शोधपत्र में आए तथ्य

खबर सार :-

चित्र कभी सोचने को मजबूर कर देते हैं तो कभी बोलने के लिए विवश कर देते हैं। इनको हर तरह के अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जा सकता है। यह शोध का विषय अब प्रस्तुतिकरण के लिए तैयार हैं।
bhu के व्यवहारिक कला विभाग के two research papers अंतरराष्ट्रीय मंच पर होंगे प्रस्तुत

खबर विस्तार : -

वाराणसी, चित्र केवल कहानी कहने का माध्यम नहीं हैं। इनमें सामाजिक स्मृति, पहचान और विरोध की क्षमता भी होती है। रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल की जाने वाली माचिस की एक छोटी-सी डिबिया में भी कला के माध्यम से विज्ञापन, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का इतिहास छिपा हो सकता है। अध्ययन के जरिए दृश्य संचार के दो महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाने की कोशिशें की गई हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के व्यवहारिक कला विभाग के दो शोधपत्रों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने का वक्त आ गया है।

व्यवहारिक कला विभाग, दृश्य कला संकाय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के दोनों शोधपत्र आईआईटी गुवाहाटी के डिजाइन विभाग की ओर से आयोजित अंतरराष्ट्रीय डिजाइन एवं नवाचार अध्ययन सम्मेलन इंडीस 2026 के लिए चयनित हुए हैं। इन शोधपत्रों के लिए 28 से 30 सितंबर तक आईआईटी गुवाहाटी में अच्छा अवसर है। इन दोनों शोधपत्रों का प्रस्तुतिकरण प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष प्रो. मनीष अरोड़ा व्यवहारिक कला विभाग की ओर से किया जाएगा। इंडीस डिजाइन एवं नवाचार अध्ययन पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन श्रृंखला का पहला आयोजन है।

माचिस पर बनाया गया चित्र भी है देता संदेश

आयोजन में शोधपत्रों की प्रस्तुति तो होगी ही, साथ में मुख्य व्याख्यान का भी अवसर दिया जा रहा है। यहां पर विद्धानों को कार्यशालाओं में एवं परिचर्चाओं में सुना भी जाएगा। आयोजन में बेहतरीन प्रदर्शनियां लोगों को शोध करने जैसे विषय बिना मांगे दे सकते हैं। उद्योग और शिक्षाविदों के बीच संवाद करने का अवसर इसी कार्यक्रम का हिस्सा बनने जा रहे हैं। भीमायना’ और ‘द 500 इयर्स ऑफ रेजिस्टेंस कॉमिक’ में प्रतिरोध की दृश्य भाषा। बीएचयू की ओर से प्रस्तुत किए जाने वाले पहले शोधपत्र का शीर्षक है।

इस शोध के लेखक शिवम मौर्य, पीएच.डी. शोधार्थी, प्रो. मनीष अरोड़ा, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, तथा सृष्टि प्रजापति, सहायक प्रोफेसर, व्यवहारिक कला विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय हैं। इनके शोध में कुछ खास बातें हो सकती हैं। इनमें ग्राफिक कथा को केवल मनोरंजन या पारंपरिक हास्यचित्र की दृष्टि से नहीं देखा गया है।

अध्ययन के निचोड़ को हम देशज कला परंपराओं और सामाजिक अनुभवों से विकसित दृश्य भाषा कह सकते हैं, जो ग्राफिक कथा संरचनाओं से अलग अपनी स्वतंत्र कथन शैली विकसित करती है। यह खुद अपनी बात अपने तरीके से कहती और समझाती है। विशेष रूप से ‘भीमायना’ और ‘द 500 इयर्स ऑफ रेजिस्टेंस कॉमिक’ के अध्ययन के माध्यम से प्रतीक, रेखा, आकृति, रंग, दृश्य संरचना और कथानक को सामाजिक प्रतिरोध तथा सांस्कृतिक स्मृति के वाहक के रूप में देखा गया है। 

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दूसरे शोधपत्र में माचिस की डिबिया एक साथ कई चीजों का अध्ययन कराती है। यह बताती है कि भारत में दृश्य संस्कृति, राष्ट्रीय पहचान और पैकेजिंग डिजाइन” विषय पर आधारित है। इसका लेखन मोनाली सिंह, हिमेश बाबूलाल तथा डॉ. आशीष कुमार गुप्ता, व्यवहारिक कला विभाग, दृश्य कला संकाय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने किया है। माचिस की डिबिया को कई अर्थाें में देखा गया है। यह तो लेखक यानी विद्वानों ने इसे तमाम तरह से परिभाषित किया है। इनके अध्ययन में माचिस के लेबल को महज पैकेजिंग या सजावटी चित्र के रूप में न देखकर सीमित न कर दें।

ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में इसका अध्ययन किया

यह भारत का दृश्य संचार का तरीका है। आज से नहीं, सालों से हम ऐसा करते आए हैं। भारतीय विज्ञापन को यदि हम समझ लें तो यह एक परिभाषा तय कर देती है। विद्वानों ने दृश्य संचार के ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में इसका अध्ययन किया है। पूरा निचोड़ देने के लिए 48 चयनित माचिस लेबलों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में ब्रांड एवं व्यापार नाम, पौराणिक एवं धार्मिक चित्र, राजपरिवारों को शामिल किया गया है। इसमें ही प्रसिद्ध व्यक्तियों के चित्र, राष्ट्रीय प्रतीक तथा उत्पाद-विज्ञापन जैसी पांच प्रमुख श्रेणियां बनाकर निष्कर्ष निकाला है।

किसी चीज का विरोध करने की है ताकत

इनके अध्ययन में सामने आया कि माचिस के छोटे आकार के लेबल पर भी चित्र बनाए जाते हैं। इनमें रंग, अक्षर-विन्यास, प्रतीक हो सकते हैं। या सभी एक साथ हों। इनका काम दृष्य संरचना के माध्यम से व्यापक रूप में समाज मंे देना हो सकता है। यह संदेश भी कई तरह के होते हैं। जैसे सांस्कृतिक संदेश दिए जाते थे। समय के साथ विदेशी चित्रों और भाषाओं की जगह भारतीय पौराणिक कथाओं, व्यक्तित्वों और स्थानीय प्रतीकों का प्रयोग बढ़ा है। यह देश के प्रति चेतना का माध्यम बन सकते हैं। इनमें चरखा, अशोक चक्र, भारतीय ध्वज और राष्ट्रीय नेताओं के चित्र आदि हो सकते हैं। भारतीय पैकेजिंग, ब्रांडिंग और व्यावसायिक कला के इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण है।

आने वाले दिनों में इनका प्रस्तुतिकरण है होना

दोनों शोधपत्रों की अपनी विशेषताएं भी हैं। पहला शोध ग्राफिक कथाओं के माध्यम से देशज सौंदर्यबोध, सामाजिक प्रतिरोध और वैकल्पिक दृश्य कथाकथन को सामने लाता है। इसमें समझने वाले दूसरे शोध को भी सराह सकते हैं, जरूरी नहीं।  यह अध्ययन का विषय है। दूसरा, माचिस के छोटे-से लेबल में विज्ञापन, पैकेजिंग, राष्ट्रीय पहचान और भारतीय ग्राफिक डिजाइन के विकास की कहानी तलाशता है। यह दोनों की महत्वपूर्ण हैं। यदि यह महत्वपूर्ण न होते तो इसमें शोध की जरूरत न पड़ती। बहरहाल, अब आने वाले दिनों में इनका प्रस्तुतिकरण होना है। यह लोग बधाई के पात्र भी हैं। 

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