FY30 तक 992 अरब डॉलर का होगा भारत का किराना बाजार, टियर-2 और टियर-3 शहर बनेंगे ग्रोथ के सबसे बड़े इंजन
खबर सार :-
भारत का किराना बाजार आने वाले वर्षों में अभूतपूर्व विस्तार की ओर बढ़ रहा है। बढ़ती आय, छोटे शहरों की मांग, क्षेत्रीय ब्रांडों की लोकप्रियता और डिजिटल कॉमर्स के विस्तार से यह क्षेत्र नई ऊंचाइयों पर पहुंच सकता है। जो कंपनियां स्थानीय जरूरतों, किफायती उत्पादों और प्रभावी वितरण व्यवस्था पर ध्यान देंगी, वही भविष्य के इस विशाल बाजार में सबसे अधिक लाभ हासिल कर सकेंगी।
खबर विस्तार : -
India grocery market: भारत का घरेलू किराना बाजार आने वाले वर्षों में तेज़ी से विस्तार करने जा रहा है। रेडसीर की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2030 (FY30) तक देश का किराना बाजार बढ़कर 992 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। वर्तमान में यह बाजार लगभग 658 अरब डॉलर का है और अगले पांच वर्षों में 8 प्रतिशत से अधिक की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से आगे बढ़ने का अनुमान है। रिपोर्ट बताती है कि भारत में किराना खरीदारी का प्रमुख माध्यम अभी भी पारंपरिक स्टोर ही हैं, जहां करीब 91 प्रतिशत खरीदारी ऑफलाइन होती है। इससे स्पष्ट है कि डिजिटल किराना बाजार की हिस्सेदारी अभी सीमित है, लेकिन इसमें तेज़ी से विस्तार की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
2030 तक भारत के 15 करोड़ से अधिक परिवारों तक पहुंच
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2030 तक भारत के 15 करोड़ से अधिक परिवारों का संयुक्त वार्षिक उपभोग व्यय 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो जाएगा। इस कुल खर्च में सबसे बड़ी हिस्सेदारी किराना उत्पादों की होगी। बढ़ती आय, शहरीकरण, उपभोक्ताओं की बदलती जीवनशैली और संगठित खुदरा कारोबार के विस्तार से किराना बाजार को मजबूत गति मिलने की उम्मीद है। यही कारण है कि कंपनियां अब केवल महानगरों पर निर्भर रहने के बजाय छोटे शहरों और कस्बों पर विशेष ध्यान दे रही हैं।
टियर-2 और टियर-3 शहरों से बढ़ेगा कारोबार
विशेषज्ञों का मानना है कि अगले दशक में किराना कारोबार की वास्तविक वृद्धि टियर-2 और टियर-3 शहरों से आएगी। हालांकि, इन बाजारों में सफलता पाने के लिए महानगरों में अपनाई गई रणनीतियां पर्याप्त नहीं होंगी। कंपनियों को स्थानीय ग्राहकों की जरूरत, खरीद क्षमता और पसंद को ध्यान में रखते हुए अपने उत्पाद पोर्टफोलियो, मूल्य निर्धारण और वितरण प्रणाली में बदलाव करना होगा। क्षेत्रीय स्तर पर अलग-अलग उपभोक्ता व्यवहार को समझना भविष्य की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी माना जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि भारतीय उपभोक्ता अब क्षेत्रीय स्वाद वाले उत्पाद, छोटे पैक साइज, किफायती कीमत और स्वास्थ्यवर्धक पैक्ड फूड को तेजी से अपना रहे हैं। खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में कम कीमत वाले पैक और स्थानीय ब्रांडों की मांग लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि कई कंपनियां क्षेत्रीय उत्पादों और निजी ब्रांड (प्राइवेट लेबल) पर अधिक निवेश कर रही हैं।
278 क्षेत्रीय और प्राइवेट लेबल ब्रांड
'वैल्यू ग्रॉसरी' मॉडल इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभर रहा है। इस मॉडल में क्षेत्रीय उत्पादों, प्राइवेट लेबल ब्रांड और कम लागत वाली डिलीवरी व्यवस्था पर विशेष जोर दिया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, एक बड़े वैल्यू ग्रॉसरी प्लेटफॉर्म के पास लगभग 278 क्षेत्रीय और प्राइवेट लेबल ब्रांड मौजूद हैं, जो पारंपरिक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की तुलना में तीन गुना से भी अधिक हैं। इसके अलावा, ऐसे प्लेटफॉर्म के लगभग 58 प्रतिशत एसकेयू (स्टॉक कीपिंग यूनिट) क्षेत्रीय या प्राइवेट लेबल वाले होते हैं, जबकि पारंपरिक ई-कॉमर्स कंपनियों में यह हिस्सा केवल 18 से 20 प्रतिशत तक सीमित रहता है।
10 करोड़ ऑनलाइन ग्राहकों को डिजिटल कॉमर्स से जोड़ने का लक्ष्य
विश्लेषकों का कहना है कि कम लागत वाली आपूर्ति श्रृंखला, स्थानीय उत्पादों की बेहतर उपलब्धता और ग्राहकों की आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पाद पेश करने की रणनीति भविष्य में वैल्यू ग्रॉसरी मॉडल को मजबूत बनाएगी। यही मॉडल देश के अगले 10 करोड़ ऑनलाइन ग्राहकों को डिजिटल कॉमर्स से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भरोसा बढ़ने, स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुंच में विस्तार तथा तेज़ डिलीवरी सेवाओं के कारण ऑनलाइन किराना कारोबार भी लगातार बढ़ेगा। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वर्ष 2030 तक भारतीय परिवार हर साल लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर मूल्य के सामान और सेवाओं का उपभोग करेंगे। इस विशाल उपभोक्ता बाजार की नींव 15 करोड़ से अधिक ऐसे परिवार होंगे, जिनकी खर्च करने की क्षमता हर वर्ष लगभग 4 से 5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। ऐसे में संगठित खुदरा कंपनियों, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और स्थानीय ब्रांडों के लिए भारतीय किराना बाजार दुनिया के सबसे आकर्षक अवसरों में से एक बनकर उभर रहा है।
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