RBI का बड़ा कदम: बैंकिंग सिस्टम में डाले 1.41 लाख करोड़ रुपये, GST भुगतान से घटी तरलता को मिला सहारा
खबर सार :-
बैंकिंग सिस्टम में अचानक आई नकदी कमी को दूर करने के लिए आरबीआई द्वारा 1.41 लाख करोड़ रुपये की वीआरआर नीलामी एक महत्वपूर्ण कदम है। जीएसटी भुगतान से पैदा हुए दबाव के बीच यह फैसला अल्पकालिक ब्याज दरों को नियंत्रित रखने और वित्तीय प्रणाली में क्रेडिट फ्लो बनाए रखने में मदद करेगा। इससे बाजार में स्थिरता बनी रहेगी और बैंकों की फंडिंग जरूरतें सुचारू रूप से पूरी होंगी।
खबर विस्तार : -
RBI Liquidity Injection: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकिंग प्रणाली में नकदी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए बड़ा कदम उठाते हुए मंगलवार को सात दिन की वेरिएबल रेट रेपो (वीआरआर) नीलामी के माध्यम से 1.41 लाख करोड़ रुपये से अधिक की अस्थायी तरलता उपलब्ध कराई। केंद्रीय बैंक का यह कदम ऐसे समय आया है जब बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अधिशेष नकदी तेजी से घटकर घाटे में बदल गई है और अल्पकालिक फंडिंग लागत पर दबाव बढ़ने लगा है। आरबीआई द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, यह राशि 5.26 प्रतिशत की कट-ऑफ दर और वेटेड एवरेज दर पर उपलब्ध कराई गई। इस कदम का मुख्य उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में नकदी की कमी को दूर करना और वित्तीय संस्थानों के लिए अल्पकालिक फंडिंग को सुगम बनाना है।
अधिशेष से घाटे में पहुंची बैंकिंग तरलता
हाल के दिनों में बैंकिंग प्रणाली की तरलता में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। 21 जून को जहां बैंकिंग सिस्टम में 30,685.11 करोड़ रुपये का अधिशेष था, वहीं 22 जून तक स्थिति बदलकर 19,971.89 करोड़ रुपये के घाटे में पहुंच गई। यह बदलाव दर्शाता है कि सिस्टम से बड़ी मात्रा में नकदी बाहर निकली है, जिससे बैंकों के लिए फंड की उपलब्धता प्रभावित हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) भुगतान के कारण बैंकों से बड़ी मात्रा में धन सरकार के खातों में स्थानांतरित हुआ, जिससे बैंकिंग प्रणाली में नकदी का स्तर घट गया। हर महीने जीएसटी भुगतान के दौरान इस प्रकार की अस्थायी तरलता कमी देखी जाती है।
मनी मार्केट दरों पर बढ़ा दबाव
तरलता में कमी का असर सीधे मनी मार्केट पर दिखाई देने लगा है। वेटेड एवरेज कॉल मनी रेट (डब्ल्यूएसीएमआर) 5.43 प्रतिशत पर कारोबार कर रहा है, जो आरबीआई के रेपो रेट से लगभग 0.18 प्रतिशत अधिक है। आमतौर पर जब बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त नकदी उपलब्ध होती है, तब अल्पकालिक ब्याज दरें रेपो रेट के आसपास बनी रहती हैं। लेकिन नकदी की कमी होने पर बैंक एक-दूसरे से अधिक दर पर उधार लेने को मजबूर होते हैं, जिससे मनी मार्केट रेट्स बढ़ जाते हैं। यही स्थिति फिलहाल देखने को मिल रही है।
वीआरआर नीलामी कैसे करती है काम?
वेरिएबल रेट रेपो (वीआरआर) नीलामी आरबीआई का एक महत्वपूर्ण मौद्रिक उपकरण है, जिसके माध्यम से केंद्रीय बैंक अल्पकालिक अवधि के लिए बैंकिंग सिस्टम में नकदी उपलब्ध कराता है। इस प्रक्रिया में बैंक अपनी पात्र सरकारी प्रतिभूतियां (गवर्नमेंट सिक्योरिटीज) गिरवी रखकर आरबीआई से धन प्राप्त करते हैं। आरबीआई अक्सर तीन दिन या सात दिन की अवधि वाली वीआरआर नीलामियां आयोजित करता है। इसका उद्देश्य बाजार में अचानक पैदा हुई नकदी की कमी को दूर करना और ब्याज दरों को नियंत्रित दायरे में बनाए रखना होता है।
क्रेडिट फ्लो बनाए रखने पर आरबीआई का फोकस
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बैंकिंग प्रणाली में तरलता की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर कर्ज वितरण और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। ऐसे में आरबीआई समय-समय पर हस्तक्षेप कर यह सुनिश्चित करता है कि वित्तीय प्रणाली में ऋण प्रवाह सुचारू बना रहे। केंद्रीय बैंक टैक्स भुगतान, एडवांस टैक्स जमा, सरकारी लेनदेन और मौसमी ऋण मांग जैसी परिस्थितियों से उत्पन्न नकदी दबाव को कम करने के लिए विभिन्न मौद्रिक उपाय अपनाता है। इससे बैंकिंग प्रणाली में स्थिरता बनी रहती है और बाजार में अनावश्यक उतार-चढ़ाव नहीं आता।
दीर्घकालिक तरलता के लिए भी सक्रिय रहता है केंद्रीय बैंक
अल्पकालिक उपायों के अलावा आरबीआई दीर्घकालिक तरलता प्रबंधन के लिए भी कदम उठाता है। जब सिस्टम में लंबे समय तक नकदी की आवश्यकता होती है, तब केंद्रीय बैंक खुले बाजार परिचालन (ओएमओ) के तहत सेकेंडरी मार्केट से सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद करता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से बैंकिंग सिस्टम में स्थायी रूप से नकदी का प्रवाह बढ़ता है। इससे बैंकों को अपनी नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने और कर्ज वितरण जारी रखने में सुविधा मिलती है।
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