योग शरीर,मन एवं आत्मा को जोड़ने की भारतीय प्रणाली है: डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय

खबर सार :-
नई दिल्ली के केशवकुंज में आयोजित विशेष व्याख्यान में विद्वानों ने भारत की प्राचीन योग परंपरा, उसके इतिहास, सांस्कृतिक महत्व और वैश्विक प्रभाव पर विस्तार से चर्चा की। 150 से अधिक शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी शामिल हुए।
योग शरीर,मन एवं आत्मा को जोड़ने की भारतीय प्रणाली है: डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय
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नई दिल्ली: केशवकुंज, झंडेवालान स्थित अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केंद्रीय कार्यालय में 6 जून 2026 को भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रांत तथा माधव संस्कृति न्यास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “नामूलं लिख्यते किञ्चित” व्याख्यानमाला के अंतर्गत “भारत की विविध योग परंपरा का इतिहास” विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देशभर के इतिहासकारों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

योग का बताया इतिहास

व्याख्यानमाला के संरक्षक एवं मुख्य अतिथि, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय ने अपने प्रेरक उद्बोधन में योग को भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रकाश स्तंभ बताया। उन्होंने कहा कि योग भारतीय आध्यात्मिक चेतना की निरंतरता, समन्वय और समग्र स्वास्थ्य का प्रमुख आधार है। यह सनातन वैदिक परंपरा का दिव्य आयाम है, जिसने हजारों वर्षों से मानव जीवन को संतुलित और स्वस्थ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि लगभग 5000 वर्ष पूर्व भारत में विकसित योग शरीर, मन और आत्मा को जोड़ने वाली ऐसी वैज्ञानिक पद्धति है, जो आज भी वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य और कल्याण की विश्वसनीय प्रणाली के रूप में स्वीकार की जा रही है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता आचार्य (डॉ.) रजनीश कुमार शुक्ल, पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे। उन्होंने “भारत की विविध योग परंपरा का इतिहास” विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि योग की परंपरा अत्यंत प्राचीन है और इसकी जड़ें सिंधु-सरस्वती सभ्यता तक पहुंचती हैं। उन्होंने बताया कि समय के साथ योग वेदों, उपनिषदों, महाभारत, भगवद्गीता, पतंजलि योगसूत्र, हठयोग, भक्ति योग और आधुनिक योग आंदोलन के माध्यम से निरंतर विकसित होता रहा है। आज योग भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान बन चुका है। उन्होंने कहा कि योग की शुचिता और आंतरिक पवित्रता केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामूहिक कल्याण से भी जुड़ी हुई है।

कई गणमान्य लोग रहे मौजूद

कार्यक्रम का संचालन भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के उपनिदेशक एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख डॉ. सौरभ कुमार मिश्र ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन दिल्ली प्रांत की कार्यकारिणी के सदस्य डॉ. संजीव कुमार मिश्र ने प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता पद्मश्री सम्मानित पुरातत्वविद्, इतिहासकार एवं कला समीक्षक प्रो. बुद्ध रश्मि मणि ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि योग का मूल उद्देश्य आत्मा को परम सत्ता से जोड़ना है। आसन और प्राणायाम के माध्यम से शरीर और मन के बीच संतुलन स्थापित होता है, जो व्यक्ति के समग्र विकास का आधार बनता है। उन्होंने कहा कि योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रभावी माध्यम है। योग का वास्तविक अर्थ जुड़ाव और एकत्व है, जो व्यक्ति को स्वयं, समाज और परम सत्य से जोड़ता है।

इस अवसर पर प्रो. सुस्मिता पाण्डे, सुरेन्द्र हंस, डॉ. नरेंद्र शुक्ल, प्रो. रमेश कुमार मिश्र, शत्रुजीत सिंह, प्रो. धर्मचंद चौबे, प्रो. अखिलेश कुमार दुबे, प्रो. युथिका मिश्र, डॉ. अजय सिंह, डॉ. अस्मित शर्मा, श्री सचिन झा, मुकेश उपाध्याय सहित अनेक शिक्षाविद्, पदाधिकारी एवं शोधार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में 150 से अधिक शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थियों ने सहभागिता की। व्याख्यानमाला के समापन के पश्चात प्रतिभागियों के लिए जलपान की व्यवस्था भी की गई।

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