बदलती वैश्विक व्यवस्था और अमेरिका की भूमिका

खबर सार :-
वैश्विक अनिश्चितता के बीच अमेरिका की दक्षिण एशिया नीति सीमाओं और विरोधाभासों से घिरी दिखती है। भारत-पाकिस्तान तनाव में भूमिका बढ़ा-चढ़ाकर बताना भरोसे को कमजोर करता है, जबकि बांग्लादेश में घटती अमेरिकी भागीदारी लोकतांत्रिक अस्थिरता बढ़ा रही है। भारत के लिए क्षेत्रीय स्थिरता सर्वोपरि है। अमेरिका को अतिशयोक्ति छोड़ दीर्घकालिक, संतुलित और सॉफ्ट पावर आधारित नीति अपनानी होगी। तभी दक्षिण एशिया में विश्वसनीय नेतृत्व संभव हो पाएगा आगे।

बदलती वैश्विक व्यवस्था और अमेरिका की भूमिका
खबर विस्तार : -

Global uncertainty: आज की दुनिया बहुस्तरीय अनिश्चितताओं से घिरी हुई है। विश्व में कई देशों के बीच संघर्ष की स्थितियां हैं। यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में अस्थिरता, चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा और वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण अनिश्चितता बढ़ रही है। ऐसे माहौल में अमेरिका की विदेश नीति भी दबाव में है। खासतौर पर दक्षिण एशिया, जहां भारत-पाकिस्तान का तनाव और बांग्लादेश की राजनीतिक अनिश्चितता अमेरिका के लिए कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियां पेश कर रही है। हाल ही में अमेरिकी सीनेटर और सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी के अध्यक्ष मार्क वॉर्नर के बयानों ने इस क्षेत्र में अमेरिका की भूमिका और सीमाओं पर नई बहस छेड़ दी है।

भारत-पाकिस्तान तनाव: अमेरिका के दावे और हकीकत

अमेरिकी सीनेटर मार्क वॉर्नर का यह कहना कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने में अमेरिका की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया, कई मायनों में अहम है। अमेरिका अक्सर खुद को वैश्विक संकटों का “समाधानकर्ता” बताता रहा है, लेकिन वॉर्नर के अनुसार हालिया भारत-पाकिस्तान तनाव का समाधान मुख्यतः दोनों देशों के आपसी संवाद और स्थापित चैनलों के जरिए हुआ। यह बयान अमेरिकी विदेश नीति के उस चलन पर सवाल उठाता है, जिसमें हर क्षेत्रीय सफलता का श्रेय वॉशिंगटन खुद लेने की कोशिश करता है। वॉर्नर ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध खुफिया जानकारी और भारतीय-अमेरिकी अधिकारियों से मिली सूचनाएं यह नहीं बतातीं कि अमेरिका ने अकेले कोई निर्णायक भूमिका निभाई।

परमाणु पड़ोसी और “जाना-पहचाना पैटर्न”

भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु संपन्न देश हैं, इसलिए हर तनाव को वैश्विक मीडिया “बड़ी तबाही” के रूप में पेश करता है। वॉर्नर ने माना कि स्थिति गंभीर थी, लेकिन नई नहीं। सीमा पार आतंकवाद, किसी आतंकी घटना के बाद तनाव और फिर बैक-चैनल डिप्लोमेसी-यह पैटर्न पहले भी कई बार देखा जा चुका है। इस संदर्भ में अमेरिका की भूमिका सहयोगी या सहायक हो सकती है, लेकिन निर्णायक नहीं। भारत-पाकिस्तान संबंधों की जटिलता को बाहरी हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय समझ और जिम्मेदार व्यवहार से ही संभाला जा सकता है।

ट्रंप फैक्टर और कूटनीतिक नुकसान

वॉर्नर की आलोचना का एक बड़ा हिस्सा पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की शैली पर केंद्रित है। उनका मानना है कि ट्रंप अक्सर विदेश नीति के नतीजों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं-चाहे वह भारत-पाकिस्तान सीजफायर हो या ईरान पर सैन्य कार्रवाई। इस तरह की बयानबाजी का कूटनीतिक नुकसान यह होता है कि सहयोगी देशों में अविश्वास पैदा होता है। भारत जैसे देश, जो रणनीतिक स्वायत्तता में विश्वास रखते हैं, ऐसी अतिशयोक्तियों को पसंद नहीं करते। भारत के साथ चल रहे टैरिफ विवाद को भी वॉर्नर ने इसी नाराजगी से जोड़ा, जहां यह धारणा बनी कि अमेरिका को “श्रेय” नहीं मिला।

भारत-अमेरिका संबंध: दीर्घकालिक साझेदारी बनाम तात्कालिक राजनीति

वॉर्नर ने चेतावनी दी कि रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए दांव पर नहीं लगाना चाहिए। भारत रातों-रात किसी एक साझेदार पर निर्भर नहीं हो सकता। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारत की नई पीढ़ी अमेरिका के साथ मजबूत रिश्तों के पक्ष में है और भारत अब पाकिस्तान-केंद्रित सोच से आगे बढ़ चुका है। यह अमेरिका के लिए अवसर भी है, लेकिन तभी जब वह भरोसे और सम्मान पर आधारित नीति अपनाए।

पाकिस्तान की आर्थिक चुनौतियां और नजरिया

पाकिस्तान पर टिप्पणी करते हुए वॉर्नर ने कहा कि वह अक्सर अपनी आर्थिक समस्याओं के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराता है और भारत-केंद्रित दृष्टिकोण से बाहर नहीं निकल पा रहा। यह नजरिया न सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता को भी कमजोर करता है। अमेरिका के लिए पाकिस्तान अब पहले जैसी प्राथमिकता नहीं रहा, खासकर अफगानिस्तान से वापसी के बाद। इससे पाकिस्तान-अमेरिका संबंधों में भी ठंडापन आया है।

बांग्लादेश: चुनाव, अनिश्चितता और अमेरिका का पीछे हटना

दक्षिण एशिया में अमेरिका की चुनौती सिर्फ भारत-पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। बांग्लादेश के आगामी चुनावों को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ रही है। वॉर्नर के अनुसार, अमेरिका की भागीदारी कम होने से वहां लोकतांत्रिक समर्थन कमजोर पड़ा है। उन्होंने स्वीकार किया कि यह कहना मुश्किल है कि चुनाव पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे या नहीं। ट्रंप प्रशासन के दौरान विकासशील देशों के लिए आर्थिक और मानवीय सहायता में कटौती ने अमेरिकी “सॉफ्ट पावर” को नुकसान पहुंचाया है।

सॉफ्ट पावर का क्षरण और उसके परिणाम

अमेरिका की ताकत सिर्फ उसकी सेना या अर्थव्यवस्था से नहीं आई, बल्कि दशकों तक लोकतंत्र, विकास और संस्थागत निर्माण में सहयोग से आई। बांग्लादेश जैसे देशों में इन कार्यक्रमों की कटौती से अमेरिका का प्रभाव घटा है। वॉर्नर ने कहा कि मोहम्मद यूनुस के उभरने के बाद बदलाव की उम्मीद थी, लेकिन वह अब फीकी पड़ती दिख रही है। गरीबी, आर्थिक तनाव, पर्यावरणीय जोखिम और सीमित राजनीतिक स्पेस-ये सभी बांग्लादेश की चुनौतियां हैं।

भारत के लिए बांग्लादेश का महत्व

बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिरता भारत के लिए सीधे तौर पर महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच लंबी सीमा, गहरे व्यापारिक रिश्ते और पूर्वी भारत में सुरक्षा व माइग्रेशन से जुड़ी चिंताएं जुड़ी हैं। अगर बांग्लादेश में अस्थिरता बढ़ती है, तो उसका असर भारत की आंतरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय रणनीति पर पड़ेगा। इसलिए अमेरिका का पीछे हटना केवल बांग्लादेश नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए चिंता का विषय है।

संतुलित और दीर्घकालिक अमेरिकी नीति की जरूरत

वैश्विक अनिश्चितता के इस दौर में अमेरिका के सामने चुनौती है कि वह दक्षिण एशिया में अपनी भूमिका को यथार्थवादी बनाए। भारत-पाकिस्तान तनाव में अतिशयोक्ति से बचना, भारत के साथ भरोसेमंद साझेदारी को मजबूत करना और बांग्लादेश जैसे देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं का निरंतर समर्थन-यही आगे का रास्ता है। मार्क वॉर्नर के बयान एक चेतावनी की तरह हैं कि तात्कालिक राजनीतिक लाभ और बयानबाजी से ज्यादा जरूरी है दीर्घकालिक स्थिरता। अगर अमेरिका इस संतुलन को नहीं साध पाया, तो दक्षिण एशिया में उसका प्रभाव धीरे-धीरे सिमट सकता है, और यह खाली जगह अन्य वैश्विक ताकतें भरने की कोशिश करेंगी।

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