US-Iran Tensions: मध्य-पूर्व और मध्यएशिया के बदलते सामरिक समीकरणों के बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति J. D. Vance ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका किसी लंबे क्षेत्रीय युद्ध में उलझने नहीं जा रहा। ‘एयर फोर्स टू’ में The Washington Post को दिए साक्षात्कार में उन्होंने उन आशंकाओं को खारिज किया कि वॉशिंगटन, ईरान के साथ बढ़ते तनाव के चलते एक और दीर्घकालिक संघर्ष का हिस्सा बनेगा।
वेंस का बयान ऐसे समय आया है जब Donald Trump प्रशासन ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर कई विकल्पों पर विचार कर रहा है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि सैन्य विकल्पों पर चर्चा होना असामान्य नहीं, लेकिन यह मान लेना कि अमेरिका वर्षों तक बिना किसी स्पष्ट अंत के युद्ध में उलझ जाएगा-यह वास्तविकता से परे है।

वेंस ने साफ किया कि प्राथमिकता कूटनीतिक समाधान को दी जा रही है। उनका कहना था कि अंतिम निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि तेहरान क्या कदम उठाता है। गौरतलब है कि Iran को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना वॉशिंगटन की घोषित नीति रही है। इसी संदर्भ में जिनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का दौर जारी है। मध्यस्थों के अनुसार बातचीत कठिन जरूर है, लेकिन संपर्क बना हुआ है। क्षेत्रीय पर्यवेक्षकों का मानना है कि वार्ता की सफलता या विफलता पूरे मध्य-पूर्व की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।
मध्य-पूर्व की अस्थिरता का प्रभाव मध्यएशिया तक देखा जा रहा है। ऊर्जा आपूर्ति, तेल बाजार, और सामरिक गठबंधनों पर इसका सीधा असर पड़ता है। Iraq युद्ध के बाद से अमेरिका की क्षेत्रीय भूमिका लगातार बहस का विषय रही है। 2003 के आक्रमण के बाद अमेरिकी सैन्य उपस्थिति ने भू-राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे, जिनका असर आज भी कायम है। वेंस, जो इराक युद्ध में सेवा दे चुके पूर्व मरीन हैं, विदेशी सैन्य हस्तक्षेपों को लेकर पहले भी संशय जता चुके हैं। उन्होंने दोहराया कि “अमेरिका फर्स्ट” नीति का अर्थ है-ऐसे निर्णय जो अमेरिकी जनता के दीर्घकालिक हितों की रक्षा करें, न कि देश को अंतहीन संघर्षों में झोंक दें।

अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी Israel के प्रति समर्थन को लेकर भी अमेरिकी राजनीति में मतभेद उभर रहे हैं। वेंस का मानना है कि पार्टी के भीतर इजरायल नीति पर विभिन्न दृष्टिकोणों को सुना जाना चाहिए, हालांकि उन्होंने इसे रणनीतिक साझेदार बताया। यह बहस अमेरिकी दक्षिणपंथी राजनीति में आने वाले वर्षों की दिशा तय कर सकती है।
राष्ट्रपति ट्रंप सार्वजनिक रूप से यह संकेत दे चुके हैं कि ईरान में सत्ता परिवर्तन क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बेहतर हो सकता है। हालांकि इस विचार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मतभेद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई का असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाड़ी क्षेत्र, मध्यएशिया और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ेगा।

मध्यएशिया-जहां रूस, चीन और पश्चिमी शक्तियों के हित टकराते हैं-आज नई भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है। यदि मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ता है तो इसका प्रभाव कजाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे ऊर्जा-समृद्ध देशों पर भी पड़ेगा। अमेरिका की कोशिश है कि वह एक ओर ईरान पर दबाव बनाए रखे, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय संतुलन भी साधे।
दो दशकों से अधिक समय से अमेरिका मध्य-पूर्व में सैन्य रूप से सक्रिय रहा है। लगातार सरकारों पर यह दबाव रहा है कि वे नए युद्ध से बचें। अफगानिस्तान से वापसी के बाद वॉशिंगटन पर घरेलू स्तर पर यह अपेक्षा और बढ़ गई है कि वह विदेशी युद्धों से दूरी बनाए। वेंस का ताजा बयान इसी रणनीतिक पुनर्संतुलन का संकेत माना जा रहा है-जहां सैन्य विकल्प खुले हैं, लेकिन प्राथमिकता कूटनीति को दी जा रही है।
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