West Bengal: मोदी पर बढ़ता जनविश्वास, भगवा लेता विस्तार

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जनसंघ के सह संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गृह राज्य पश्चिम बंगाल में आखिरकार भाजपा भगवा फहराने में सफल हो गई। यद्यपि दो चरणों में चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद जब एग्जिट पोल के नतीजे आये तो ममता समर्थकों को छोड़ कर आम लोगों को अनुमान हो गया था कि इस बार दीदी की सत्ता में वापसी आसान नहीं है क्योंकि पिछले 50 वर्षो में बंगाल में जो कुछ हो रहा था उससे निपटने का इंतजाम चुनाव आयोग ने पहले से ही कर रखा था। दूसरी ओर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस चुनाव में ममता को सत्ता से दूर करने के लिये बेहद गम्भीर था।

West Bengal: मोदी पर बढ़ता जनविश्वास, भगवा लेता विस्तार

आजादी के कुछ वर्षो के बाद से ही पश्चिम बंगाल का चुनाव हिंसा और अराजकता के बल पर लड़ा जाता रहा है। कांग्रेस हो या वामदल अथवा पिछले 15 वर्षो से सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस, सभी के कार्यकाल में चुनावी हिंसा सुर्खियां बनती रही है। मतदान केन्द्रों पर कब्जा, चुनाव अधिकारियों को डराना-धमकाना, मारपीट, विरोधियों की हत्या, विरोधी दलों के एजेंटों को बूथ से मारपीट कर भगा देना,मतदाताओं के जबरन वोट डाल देना, चुनाव का एक हिस्सा बन गया था। इस बार के चुनाव में किसी सीट पर अराजकता, हिंसा अथवा लूटपाट की घटना सामने नहीं आयी। राज्य के 294 सीटों पर हुये चुनाव में मात्र 15 बूथों पर दुबारा मतदान कराये गये। राज्य की फाल्टा विधान सभा  सीट का चुनाव रद्द किया गया वहां 21 मई को पुनः चुनाव कराया जायेगा। 

हिंसा विहीन चुनाव सम्पन्न होने का प्रमुख कारण राज्य में चुनाव से पहले मार्च के प्रथम सप्ताह में ही चुनावी सुरक्षा के लिये केन्द्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती को माना जा रहा है। 2 लाख 40 हजार अर्ध सैनिक बलों को पूरे राज्य में उतार दिया गया। तमाम अर्धसैनिक बलों के साथ तो आतंक निरोधी बख्तरबंद गाड़ियां भी थीं। प्रयास किया गया कि हर बूथ पर कम से कम दो अर्धसैनिक बल तैनात रहें। राज्य की पुलिस को बूथ से 100 मीटर दूर तो एजेंटों को मतदान कक्ष से बाहर रखा गया। इसके अतिरिक्त बूथों पर लगे सीसीटीवी कैमरों के कारण वोट लूटने वाले चेहरे आसपास दिखायी नहीं पड़े। सबसे बड़ी बात यह है कि गृहमंत्री ने मतदाताओं को भरोसा दिलाया कि चुनाव के बाद भी 70 हजार अर्ध सैनिक बल दो माह तक राज्य में बने रहेंगे। दरअसल अब तक चुनाव के बाद सत्ता में आने वाले दल के समर्थकों के अत्याचार और हिंसा से पीड़ित होकर तमाम विपक्षी कार्यकर्ता अपना गांव-घर छोड़ने पर मजबूर होते रहे हैं। अर्ध सैनिक बलों की तत्परता और सजगता ने निष्पक्ष मतदान का वातावरण तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। चुनाव आयोग ने उन सैकड़ों अधिकारियों के स्थानान्तरण कर दिये जिन पर मतदान प्रभावित करने के आरोप लग रहे थे।

हिन्दुओं की एकजुटता

पश्चिम बंगाल में यह तथ्य स्थापित हो चला था कि तृणमूल कांग्रेस मुस्लिमों की हितैषी पार्टी है क्योंकि वह उनके वोट बैंक ही नहीं बल्कि चुनावों में हिंसा अराजकता और बूथ लूटने में अग्रणी भूमिका निभाते आ रहे हैं। भाजपा ने 2016 में राज्य के विधान सभा चुनाव में प्रवेश किया तब उसे मात्र 3 सीटें मिली थीं। 2021 के विधान सभा चुनाव में प्रयास के बाद वह 77 सीटों तक पंहुची लेकिन मोदी और शाह की जोड़ी ने हार नहीं मानी। पांच साल तक भाजपा नेतृत्व विजय की रणनीति बनाकर धरातल पर उतारने के लिये जुझता रहा। ममता बनर्जी राज्य के लगभग 28 से 30 प्रतिशत मुस्लिम मतों पर अपना एकाधिकार मानकर अपनी विजय सुनिश्चित मान रहीं थीं। एसआईआर में 91 लाख मतों के कटने पर राज्य में जितना तांड़व मुख्यमंत्री ने किया उतना किसी अन्य राज्य में नहीं हुआ। भाजपा राज्य के हिन्दुओं को यह समझाने में सफल रही कि ममता सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर चल रही हैं जिससे पार्टी के पक्ष में माहौल बना। अब राजनीतिक कयास लगाये जा रहे हैं कि हिन्दुओं विशेषकर महिला मतदाताओं की लम्बी कतारों ने भाजपा के लिये ठीक वैसे ही एकजुट होकर मतदान किया है जैसे मुस्लिम मतदाता तृणमूल कांग्रेस के लिये करते रहे हैं। हिन्दुओं की इस एकजुटता ने भाजपा की राह आसान कर दी। 

विकास में पिछड़ता राज्य

 देश में जब भी विकास में पिछड़े राज्यों की चर्चा चलती है तो बिहार का नाम पहले आता है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई मामलों में बिहार से भी ज्यादा पश्चिम बंगाल पिछड़ा है। 1980 के दशक में  वामदलों के शासनकाल से ही राज्य में औद्योगिक विकास की रफ्तार धीमी पडती़ गई। राज्य की हिंसा ,अराजकता और खराब नीतियों के चलते निवेशक इस राज्य से दूर भागने लगे। विख्यात अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा कि जब देश के अधिकांश राज्यों की विकास की गति बढ़ रही है तो पश्चिम बंगाल की विकास गति धीमी पड़ रही है।

मोदी-शाह पर भरोसा

इस चुनाव से एक बात फिर स्थापित हो गई कि आम जनता का प्रधानमंत्री के साथ साथ गृहमंत्री अमित शाह पर भरोसा कायम है।यह बात फिर चर्चा में आ गई कि यदि यह दोनों नेता ठान लें तो कोई कार्य मुश्किल नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस चुनाव को लेकर कितने गम्भीर थे इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उन्होंने चुनावी सभाओं के बाद कई रातें कोलकता के राजभवन में रुक कर गुजारी और सुबह-सुबह नौका विहार, आम लोगों से संवाद, गलियों में रोड शो करके लोगों से जुड़ने का अभिनव प्रयोग किया क्योंकि अभी तक प्रधानमंत्री के बारे में कहा जाता है कि वह चुनावी रैलियों के बाद रात्रि में वापस दिल्ली लौट आते है लेकिन बंगाल के चुनाव में यह मिथक कई बार टूटा।

गृहमंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल में लगातार चुनावी रैलियां करते रहे तमाम विरोधी उन पर आरोप भी लगाते रहे लेकिन उससे बेफिक्र शाह अपने मिशन में लगे रहे। गृहमंत्री लगभग 15 दिन तक राज्य का दौरा किया जिसके कारण शाह के पास राज्य के हर विधान सभा के फीडबैक थे। कोलकाता में बना आधुनिक वार रूम 24 घंटे डेटा एनालिसिस करता था और गृहमंत्री शाह इस वार रूम से सीधे जुड़े रहते थे। शाह की केवल एक रणनीति थी “बूथ जीतो चुनाव जीतो”। इस नारे के साथ जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को जोड़ा गया जो नाराज थे उनको मनाया गया। कार्यकर्ताओं के सुझाव को प्रमुखता देकर उसी के अनुरूप रणनीति बनाकर कर ममता के किले को ध्वस्त किया। अब ममता की सत्ता से विदायी के बाद यह जुमला फिर चल निकला है कि मोदी है तो मुमकिन है।


 

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