Economic Survey 2026: संसद में गुरुवार को पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2026 में भारत की आर्थिक सेहत को लेकर उत्साहजनक तस्वीर पेश की गई है। सर्वे के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में देश की जीडीपी ग्रोथ रेट 7.0 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो तीन साल पहले 6.5 प्रतिशत थी। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और व्यापारिक जोखिमों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की अंदरूनी मजबूती लगातार बढ़ी है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा लोकसभा में पेश किए गए इस सर्वे में कहा गया है कि घरेलू सुधारों, बुनियादी ढांचे में निवेश और संतुलित वित्तीय नीति के चलते भारत विकास की स्थिर राह पर आगे बढ़ रहा है।
आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) के मुताबिक, बीते कुछ वर्षों में किए गए संरचनात्मक सुधारों ने भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार दिया है। जीएसटी, दिवालियापन एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), डिजिटल भुगतान और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी पहलों से आर्थिक गतिविधियों में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ी है। सर्वे में यह भी कहा गया है कि सरकारी निवेश, खासकर पूंजीगत व्यय (कैपेक्स), ने निजी निवेश को प्रोत्साहित किया है। सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश से रोजगार सृजन के साथ-साथ लॉन्ग टर्म ग्रोथ की नींव मजबूत हुई है।

आर्थिक सर्वेक्षण में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को भारत की आर्थिक मजबूती का अहम स्तंभ बताया गया है। बीते दस वर्षों में देश में हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। इसके साथ ही अंतर्देशीय जलमार्गों के जरिए माल ढुलाई में तेजी आई है। इन कदमों से लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आई है, जिससे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ी है। सर्वे के अनुसार, बेहतर परिवहन व्यवस्था से सप्लाई चेन मजबूत हुई है और उत्पादन क्षमता में इजाफा हुआ है।
सर्वेक्षण के मुताबिक, खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण महंगाई दर में कुछ बदलाव जरूर दिखता है, लेकिन सोना और चांदी को छोड़कर मुख्य महंगाई दर नियंत्रित बनी हुई है। यह संकेत देता है कि देश का सप्लाई सिस्टम पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है। बेहतर उत्पादन, कुशल परिवहन और प्रभावी भंडारण नीतियों के कारण कीमतों पर नियंत्रण संभव हो पाया है। आर्थिक सर्वे का मानना है कि यह स्थिति आने वाले समय में भी बनी रह सकती है, हालांकि वैश्विक कारकों पर नजर रखना जरूरी होगा।

राज्य स्तर पर नियमों को सरल बनाने यानी डीरिगुलेशन के प्रयासों से छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) को आगे बढ़ने का अवसर मिला है। सर्वे में कहा गया है कि इससे ये उद्योग औपचारिक अर्थव्यवस्था से बेहतर तरीके से जुड़ पा रहे हैं। MSME सेक्टर को क्रेडिट, टेक्नोलॉजी और बाजार तक बेहतर पहुंच मिलने से रोजगार के अवसर बढ़े हैं। यह भारत की दीर्घकालिक विकास क्षमता को और मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा है।
आर्थिक सर्वेक्षण में केंद्र सरकार की संतुलित वित्तीय नीति की सराहना की गई है। बीते कुछ वर्षों में सरकार ने विकास की जरूरतों और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखा है। सर्वे के अनुसार, वित्तीय घाटे को कम करने के अनुभव से यह स्पष्ट हुआ है कि स्पष्ट लक्ष्य जरूरी हैं, लेकिन नीतियों में लचीलापन भी उतना ही अहम है। इससे अनिश्चित परिस्थितियों में विकास पर नकारात्मक असर नहीं पड़ता।
इकोनॉमिक सर्वे में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में यह लक्ष्य तय किया गया था कि वित्त वर्ष 2025-26 तक वित्तीय घाटा जीडीपी के 4.5 प्रतिशत से नीचे लाया जाएगा। इसके लिए हर साल सख्त लक्ष्य तय करने की बजाय मध्यम अवधि की रणनीति अपनाई गई। इस रणनीति का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि पूंजीगत खर्च और विकास परियोजनाओं पर असर न पड़े। सर्वे का मानना है कि यह दृष्टिकोण आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में सफल रहा है।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि दुनिया में भू-राजनीतिक बदलाव, व्यापार विवाद और सप्लाई चेन में बदलाव आने वाले वर्षों में निवेश और विकास को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि भारत के लिए मौजूदा वैश्विक हालात किसी तात्कालिक संकट की बजाय बाहरी अनिश्चितताओं का संकेत देते हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि सर्वे में पेश किए गए आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत सही दिशा में फैसले ले रहा है और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर मजबूती से आगे बढ़ रहा है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2026 के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.8 से 7.2 प्रतिशत के बीच रह सकती है। घरेलू मांग, सरकारी निवेश और सुधरती निजी निवेश संभावनाएं विकास को सहारा देंगी। सर्वे में यह भी कहा गया है कि घरों, कंपनियों और बैंकों की वित्तीय स्थिति पहले से बेहतर हुई है, जिससे बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता बढ़ी है।
सर्वे के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 में महंगाई दर वित्त वर्ष 2026 की तुलना में थोड़ी बढ़ सकती है, लेकिन यह आरबीआई के लक्ष्य दायरे (4%) के भीतर रहने की उम्मीद है। कॉपर, एल्युमिनियम और लोहे जैसे प्रमुख मेटल की कीमतों में तेजी, रुपये में कमजोरी और सोने-चांदी की महंगी कीमतें महंगाई के जोखिम बढ़ा सकती हैं। वहीं, खाद्य महंगाई में आगे बड़ी गिरावट की संभावना सीमित बताई गई है।
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