1984 Sikh Riots Sajjan Kumar: दिल्ली की एक अदालतों से आई एक खबर ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के जख्मों को फिर से कुरेद दिया है। दशकों पुराने इस काले अध्याय में एक नया और चौंकाने वाला मोड़ आया है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को जनकपुरी और विकासपुरी हिंसा मामलों में बड़ी राहत देते हुए बरी कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब पीड़ित परिवार सालों से इस उम्मीद में इंतजार कर रहे थे कि उन्हें आखिरकार पूरा न्याय मिलेगा। 78 साल के सज्जन कुमार, जिन्हें इन दंगों के पीछे मुख्य चेहरों में से एक माना जाता था, अब इस खास मामले में आरोपों से बरी हो गए हैं।
यह मामला 31 अक्टूबर, 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख बॉडीगार्ड्स द्वारा हत्या के बाद भड़के दंगों के दौरान हुई हिंसा के आरोपों से जुड़ा था। पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार पर जनकपुरी में दो सिखों, सोहन सिंह और उनके दामाद अवतार सिंह की हत्या और विकासपुरी में गुरचरण सिंह को जिंदा जलाने के आरोप थे। दशकों बाद, जस्टिस जीपी माथुर कमेटी की सिफारिश पर 114 मामलों को फिर से खोलने के लिए एक SIT बनाई गई थी। अगस्त 2023 में, ट्रायल कोर्ट ने औपचारिक रूप से सज्जन कुमार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय किए, लेकिन धारा 302 के तहत हत्या के आरोप को हटाने का फैसला किया, जिसे शुरू में SIT ने लगाया था।
इस मामले में ट्रायल पिछले साल 23 सितंबर को खत्म हुआ था, जिसके बाद कोर्ट ने 22 दिसंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इससे पहले, सज्जन कुमार ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि वह निर्दोष हैं। उन्होंने कहा कि वह सपने में भी ऐसी किसी हिंसा में शामिल होने की बात नहीं सोच सकते। सज्जन कुमार ने दावा किया कि इन घटनाओं से उन्हें जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं है और जोर देकर कहा कि वह हिंसा वाली जगहों पर मौजूद नहीं थे।
9 नवंबर, 2023 को, कोर्ट ने पीड़ित मंजीत कौर का बयान दर्ज किया, जिन्होंने कहा कि उन्होंने भीड़ के सदस्यों से सुना था कि सज्जन कुमार हिंसा के दौरान मौजूद थे, लेकिन यह भी साफ किया कि उन्होंने खुद उन्हें मौके पर नहीं देखा था। दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले एक दूसरे मामले में उनके खिलाफ एक कड़ा फैसला सुनाया था, जिसमें कहा गया था कि उन्होंने "राजनीतिक संरक्षण" के कारण दशकों तक न्याय से बचने की कोशिश की और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उस सजा के खिलाफ उनकी अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
इस फैसले के बाद सिख समुदाय और पीड़ित परिवारों में गहरी निराशा देखी जा रही है। भले ही सज्जन कुमार को इस मामले में राहत मिल गई हो, लेकिन 1984 की सड़कों की चीखें अभी भी इंसाफ का इंतजार कर रही हैं। यह फैसला भारतीय न्याय प्रणाली और जांच एजेंसियों के काम करने के तरीके पर भी कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
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