शाहपुरा के बारहठ महाविद्यालय में युवा संवाद, 2047 के विकसित भारत में युवाओं की भूमिका पर हुआ मंथन
खबर सार :-
शाहपुरा के बारहठ महाविद्यालय में युवा संवाद कार्यक्रम आयोजित हुआ। 200 से अधिक युवाओं ने शिक्षा, संस्कृति, तकनीक, सोशल मीडिया और 2047 के विकसित भारत को लेकर सवाल उठाए।
खबर विस्तार : -
शाहपुरा: देश का भविष्य केवल किताबों में नहीं, बल्कि युवाओं की सोच, सवालों और संकल्पों में लिखा जाता है। इसी विचार को केंद्र में रखते हुए सोमवार को शाहपुरा के बारहठ महाविद्यालय में युवा संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में युवाओं ने देश, शिक्षा, भारतीय संस्कृति, तकनीक और मौजूदा सामाजिक चुनौतियों से जुड़े कई सवाल उठाए। वक्ताओं ने युवाओं के सवालों का जवाब देते हुए तर्कशील सोच विकसित करने, तथ्यों को समझने और समस्याओं का समाधान संवाद के माध्यम से तलाशने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, चित्तौड़ प्रांत के प्रांत कार्यवाह डॉ. शंकर लाल माली रहे। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. पुष्करराज मीणा, प्राचार्य एवं जिला अध्यक्ष, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, भीलवाड़ा उपस्थित रहे। कार्यक्रम शाहपुरा नगर संघचालक कन्हैया लाल की उपस्थिति में आयोजित हुआ। कार्यक्रम में शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, गणमान्य नागरिकों और बड़ी संख्या में युवाओं ने भाग लिया।
मां शारदे और भारत माता के समक्ष पुष्पांजलि से शुरुआत
युवा संवाद कार्यक्रम का शुभारंभ मां शारदे और भारत माता के चित्र के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इसके बाद सामूहिक रूप से वंदे मातरम् का गायन हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत के बाद युवाओं और वक्ताओं के बीच संवाद का सिलसिला शुरू हुआ। इस दौरान विद्यार्थियों ने अपनी जिज्ञासाओं और विभिन्न सामाजिक एवं शैक्षणिक मुद्दों से जुड़े सवालों को बेबाकी से सामने रखा।
‘भारत की सोच सहअस्तित्व की रही है’
मुख्य वक्ता डॉ. शंकर लाल माली ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की सोच प्रारंभ से ही सहअस्तित्व पर आधारित रही है। उन्होंने प्रकृति का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार जड़ और चेतन एक-दूसरे के साथ सहअस्तित्व में रहते हैं, उसी तरह भारतीय समाज में भी विभिन्न पीढ़ियां संवाद, सहयोग और परस्पर सम्मान के माध्यम से आगे बढ़ती रही हैं। उन्होंने कहा कि भारत का चिंतन केवल साम्राज्य विस्तार तक सीमित नहीं रहा। भारतीय संस्कृति में संपूर्ण विश्व के कल्याण की भावना को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘अतिथि देवो भवः’ जैसे संस्कार भारतीय जीवन पद्धति की व्यापक सोच को दर्शाते हैं। उन्होंने युवाओं से भारतीय चिंतन की इस परंपरा को समझने और आधुनिक समय में इसके सकारात्मक पक्षों को आगे बढ़ाने की अपील की।
भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति को विशेष सम्मान
डॉ. माली ने भारतीय संस्कृति में मातृशक्ति के सम्मान पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में नारी शक्ति को सदैव विशेष और सम्मानजनक स्थान दिया गया है। राधा-कृष्ण, गौरी-शंकर और सीता-राम जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन संबोधनों में भी कई स्थानों पर नारी का नाम पहले लिया जाना महिला सम्मान की गहरी सांस्कृतिक परंपरा को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें सामाजिक मूल्यों और जीवन जीने की दिशा देने वाले विचार भी मौजूद हैं। वेद, पुराण और गीता जैसे ग्रंथों में जीवन के विभिन्न पक्षों को समझने और परिस्थितियों के अनुसार सही मार्ग चुनने की प्रेरणा मिलती है।
तक्षशिला और नालंदा से आधुनिक तकनीक तक भारत की यात्रा
युवा संवाद के दौरान भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था और ज्ञान परंपरा पर भी चर्चा हुई। डॉ. माली ने कहा कि भारत प्राचीन काल से ही ज्ञान और शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है। तक्षशिला, नालंदा और ओदंतपुरी जैसे शिक्षा केंद्रों में देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी विद्यार्थी और विद्वान अध्ययन के लिए आते थे। उन्होंने कहा कि आज भारत के सामने अपनी गौरवशाली ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ जोड़ने की बड़ी चुनौती है। वैश्विक स्तर पर तेजी से बदलते तकनीकी परिदृश्य में विज्ञान, अनुसंधान और तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में युवाओं को इन क्षेत्रों में आगे आकर देश की प्रगति में निर्णायक भूमिका निभानी होगी।
‘सोशल मीडिया के हर विमर्श को सच न मानें’
कार्यक्रम में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और उससे जुड़ी चुनौतियों पर भी युवाओं को सचेत किया गया। डॉ. माली ने कहा कि सोशल मीडिया पर कई बार ऐसी सूचनाएं और विमर्श सामने आते हैं, जो युवाओं को भ्रमित कर सकते हैं। इसलिए किसी भी जानकारी को आंख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय युवाओं को तथ्यों की जांच और विश्लेषण करने की आदत विकसित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी मुद्दे पर निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले उसके विभिन्न पहलुओं को समझना जरूरी है। युवाओं को सवाल पूछने चाहिए, तथ्यों की पड़ताल करनी चाहिए और तर्क के आधार पर अपनी राय बनानी चाहिए। उन्होंने इसे जागरूक नागरिक और जिम्मेदार युवा की महत्वपूर्ण पहचान बताया।
2047 के विकसित भारत में युवाओं की अहम भूमिका
डॉ. माली ने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में देश के युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। उन्होंने युवाओं से विज्ञान, तकनीक, नवाचार और उद्यमिता के क्षेत्र में आगे आने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि युवाओं को अपनी प्रतिभा और ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण से जोड़ना चाहिए। देश के सामने मौजूद विभिन्न सामाजिक समस्याओं का समाधान संवाद के माध्यम से तलाशने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आंदोलन या उग्र आंदोलन कई बार राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के साथ सामाजिक और राजनीतिक वैमनस्य को भी बढ़ावा दे सकते हैं। इसलिए युवाओं को अपनी बात मजबूती के साथ रखने के साथ लोकतांत्रिक और रचनात्मक संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए।
संघ के शताब्दी वर्ष में युवा संवाद की पहल
कार्यक्रम के दौरान डॉ. माली ने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर विभिन्न सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में युवा संवाद को महत्वपूर्ण पहल बताया गया। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य युवाओं से सीधे संवाद स्थापित करना, उनकी जिज्ञासाओं को समझना और उनकी समस्याओं तथा विचारों को जानना है। उन्होंने कहा कि युवाओं के साथ सीधे संवाद से उनके विचारों और वर्तमान चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। ऐसे कार्यक्रम युवाओं को अपनी बात खुलकर रखने का अवसर भी प्रदान करते हैं।
विद्यार्थियों ने परीक्षा प्रणाली और काउंसलिंग पर उठाए सवाल
कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही। युवाओं ने केवल वक्ताओं के विचार सुनने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने पारंपरिक ज्ञान, शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और विद्यार्थियों की काउंसलिंग से जुड़े सवाल भी उठाए।
विद्यार्थियों ने सवाल किया कि देश के पारंपरिक ज्ञान को पाठ्यसामग्री का हिस्सा व्यापक स्तर पर क्यों नहीं बनाया जा रहा है। उन्होंने स्कूलों और महाविद्यालयों में नियमित काउंसलिंग व्यवस्था की जरूरत पर भी सवाल उठाया। विद्यार्थियों का कहना था कि युवा अवस्था में मार्गदर्शन और मानसिक सहयोग की आवश्यकता अधिक होती है, ऐसे में शैक्षणिक संस्थानों में नियमित काउंसलिंग की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। परीक्षा व्यवस्था को लेकर भी विद्यार्थियों ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने प्रश्नपत्र लीक जैसी समस्याओं का उल्लेख करते हुए पूछा कि परीक्षा में अनियमितताओं को रोकने के लिए कंप्यूटर आधारित परीक्षा प्रणाली को व्यापक स्तर पर क्यों नहीं अपनाया जाता। विद्यार्थियों के इन सवालों से कार्यक्रम केवल भाषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वास्तविक अर्थों में संवाद का रूप लेता दिखाई दिया। युवाओं को अपनी समस्याओं और विचारों को लोकतांत्रिक तरीके से सामने रखने के लिए प्रेरित किया गया।
200 से अधिक युवाओं ने लिया हिस्सा
मुख्य अतिथि डॉ. पुष्करराज मीणा ने युवा संवाद कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए युवाओं की सक्रिय भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि युवाओं के सवाल और उनकी जिज्ञासाएं समाज और देश की दिशा को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कार्यक्रम में शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और गणमान्य नागरिकों सहित 200 से अधिक युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान युवाओं ने शिक्षा, संस्कृति, तकनीक, सोशल मीडिया, परीक्षा प्रणाली और राष्ट्र निर्माण से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी। वक्ताओं ने युवाओं को तथ्यों पर आधारित सोच विकसित करने, अपनी जिज्ञासाओं को सवालों के रूप में सामने रखने और समस्याओं के समाधान के लिए सकारात्मक एवं लोकतांत्रिक संवाद को अपनाने का संदेश दिया। बारहठ महाविद्यालय में आयोजित यह युवा संवाद कार्यक्रम युवाओं और वक्ताओं के बीच विचारों के आदान-प्रदान का मंच बना। कार्यक्रम में जहां भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों पर चर्चा हुई, वहीं आधुनिक तकनीक, शिक्षा व्यवस्था और भविष्य की चुनौतियों पर भी विचार रखे गए। युवाओं की सक्रिय भागीदारी ने कार्यक्रम को संवाद का वास्तविक स्वरूप दिया।
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