Kolkata Taratala Shed Collapse: 'मैं मदद के लिए चिल्ला रहा था और लोग मोबाइल से रील बना रहे थे', हादसे में घायल ने बताई झकझोर देने वाली सच्चाई
खबर सार :-
कोलकाता के तारातला इलाके में गोदाम की छत गिरने की घटना में अब तक 16 मजदूरों की मौत हो गई है, वहीं कई लोगों की हालत गंभीर बनी हुई है। हादसे में घायल मजदूर ने कहा कि छत गिरने के बाद कई मजदूर उसमें दब गए थे, जबकि कुछ मदद के लिए चिल्ला रहे थे। लेकिन, आसपास मौजूद लोग मदद के बजाय वीडियो बना रहे थे।
खबर विस्तार : -
कोलकाता: तारातला वेयरहाउस गिरने के लगभग 72 घंटे बाद, जब कई घायल लोग अस्पताल से घर लौटने लगे तो मलबे के नीचे से एक ऐसी कहानी सामने आई जिसने हमारे समाज की खत्म होती इंसानियत का आईना दिखाया।
हादसे में घायल व्यक्ति ने बताया कि जब मलबे में फंसे कई लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे, तो पास खड़े स्थानीय लोग मदद करने के बजाय अपने मोबाइल फोन पर 'रील्स' बनाने में व्यस्त थे—खासकर फ्रंट-कैमरा का इस्तेमाल करके खुद को फ्रेम में कैद कर रहे थे।
समाज में बढ़ती संवेदनहीनता की झलक
घायल माणिक चंद का बयान सिर्फ घटना का विवरण नहीं है, बल्कि आज के समाज में बढ़ती संवेदनहीनता की झलक है। उन्होंने बताया, "मैं मलबे के नीचे फंसा हुआ था, ऊपर-नीचे देख रहा था और पूरी ताकत से मदद के लिए चिल्ला रहा था। फिर भी, मुझे बचाने के बजाय, कुछ लोग रील्स बनाने के लिए अपने फोन निकालने में लगे थे।" यह बयान न केवल एक व्यक्ति के दर्द को दर्शाता है, बल्कि हमारे समय की उस सच्चाई को भी दिखाता है जहां कैमरा बटन दबाने की इच्छा अक्सर इंसानियत पर भारी पड़ जाती है। कुछ लोगों के लिए जिंदगी और मौत की लड़ाई सोशल मीडिया के लिए सिर्फ एक 'कंटेंट' बनकर रह जाती है।
मदद के लिए बहुत कम लोग आए
माणिक चंद आगे कहते हैं, "मेरे साथ दर्जनों लोग मलबे के नीचे फंसे हुए थे। कुछ लोगों की तो ढांचा गिरने के तुरंत बाद ही मौत हो गई थी, क्योंकि लोहे के बीम और भारी चीजें सीधे उनके सिर पर गिरी थीं। हालांकि, कई अन्य लोग जिंदा थे और मदद की गुहार लगा रहे थे। जैसे मैं पूरी ताकत से चिल्ला रहा था, वैसे ही दूसरे लोग भी मलबे से निकलने के लिए मदद मांग रहे थे। आस-पास मौजूद सैकड़ों लोग उन चीखों को सुन सकते थे, फिर भी बहुत कम लोगों ने राहत और बचाव कार्य के लिए आगे आने की हिम्मत दिखाई।" तारातला की घटना सिर्फ निर्माण कार्य में लापरवाही का मामला नहीं है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सोशल मीडिया के इतने आदी हो गए हैं कि किसी दूसरे व्यक्ति का दुख एक 'रील' के लिए सिर्फ़ एक तमाशा बनकर रह गया है।
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