झांसी में नहीं मिला ‘पशु जन औषधि केंद्र’ योजना को रफ्तार, एक भी सहकारी समिति ने नहीं किया आवेदन
खबर सार :-
झांसी में प्रधानमंत्री पशु जन औषधि केंद्र योजना की शुरुआत अटकी। आठ प्रस्तावित केंद्रों के लिए अब तक किसी सहकारी समिति ने आवेदन नहीं किया। जिसकी वजह से झांसी में योजना की शुरुआत अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी है।
खबर विस्तार : -
झांसी: प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री पशु जन औषधि केंद्र योजना की शुरुआत झांसी में फिलहाल धीमी पड़ती नजर आ रही है। शासन द्वारा सभी जिलों में प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों की तर्ज पर पशुओं के लिए सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराने हेतु पशु जन औषधि केंद्र स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसके लिए ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित किए गए हैं, लेकिन झांसी जिले में अब तक एक भी सहकारी समिति ने आवेदन नहीं किया है। ऐसे में योजना की शुरुआत से पहले ही इसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।
सहकारी समितियां ही कर सकेंगे संचालन
शासन के निर्देशानुसार प्रत्येक विकासखंड में एक पशु जन औषधि केंद्र स्थापित किया जाना है। इस आधार पर झांसी जिले के आठ विकासखंडों में कुल आठ केंद्र खोले जाने प्रस्तावित हैं। हालांकि आवेदन प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद किसी भी सहकारी समिति ने केंद्र संचालन की जिम्मेदारी लेने में रुचि नहीं दिखाई है। इससे यह आशंका बढ़ गई है कि योजना समय पर धरातल पर उतरने में देरी हो सकती है।
योजना के तहत सबसे अहम शर्त यह है कि पशु जन औषधि केंद्र का संचालन केवल सहकारी समितियां ही कर सकेंगी। आवेदन भी संबंधित सहकारी समिति को ही करना होगा। इसके अलावा आवेदन के साथ किसी पंजीकृत फार्मासिस्ट के साथ किया गया अनुबंध भी ऑनलाइन संलग्न करना अनिवार्य है। माना जा रहा है कि यही शर्तें कई समितियों के लिए चुनौती बन रही हैं, जिसके कारण वे आवेदन करने से बच रही हैं।
यदि शासन की मंशा के अनुरूप सभी विकासखंडों में पशु जन औषधि केंद्र स्थापित हो जाते हैं तो इसका सबसे बड़ा लाभ पशुपालकों को मिलेगा। इन केंद्रों पर पशुओं के उपचार में उपयोग होने वाली जेनेरिक दवाएं बाजार मूल्य की तुलना में काफी कम कीमत पर उपलब्ध कराई जाएंगी। इससे पशुओं के इलाज पर होने वाला खर्च कम होगा और छोटे एवं मध्यम वर्ग के पशुपालकों को आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है।
वर्तमान में पशु बीमार होने पर पशुपालकों को या तो सरकारी पशु चिकित्सालय जाना पड़ता है अथवा निजी चिकित्सक को बुलाना पड़ता है। उपचार के दौरान लिखी जाने वाली दवाएं अक्सर महंगी होती हैं, जिससे पशुपालकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। ऐसे में कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता पशुपालन क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है।
अधर में लटकी हुई है स्थापना
मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी संजय कुमार सिंह ने बताया कि विभाग को अब तक एक भी आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि आवेदन प्रक्रिया जारी है और सहकारी समितियों को योजना की जानकारी देकर उन्हें आवेदन के लिए प्रेरित किया जा रहा है। विभाग को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में समितियां आगे आएंगी और योजना को गति मिलेगी।
वहीं, रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. मानवेंद्र सिंह का कहना है कि यदि यह योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है तो इसका सीधा लाभ किसानों और पशुपालकों को मिलेगा। उन्होंने बताया कि वर्तमान में पशुओं के इलाज में कई बार लंबे समय तक दवाओं का सेवन करना पड़ता है, जिनकी लागत काफी अधिक होती है। यदि वही दवाएं जेनेरिक रूप में कम कीमत पर उपलब्ध होंगी तो उपचार का खर्च काफी कम हो जाएगा।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इन केंद्रों के माध्यम से क्षेत्रवार दवाओं की मांग का रिकॉर्ड तैयार किया जा सकेगा। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किस क्षेत्र में किस प्रकार की पशु बीमारियां अधिक फैल रही हैं। भविष्य में इस आंकड़े के आधार पर रोग नियंत्रण, टीकाकरण और अन्य निवारक उपायों की बेहतर रणनीति तैयार की जा सकेगी।
सहकारी समितियों की उदासीनता के कारण आठों प्रस्तावित केंद्रों की स्थापना अधर में लटकी हुई है। अब यह देखना होगा कि विभाग जागरूकता बढ़ाकर समितियों को आवेदन के लिए तैयार कर पाता है या नहीं। यदि समय रहते केंद्र स्थापित हो जाते हैं, तो यह योजना पशुपालकों के लिए सस्ती दवा, बेहतर उपचार और पशुधन संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
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