जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग तेज, माकपा ने फारूक अब्दुल्ला को दिया समर्थन
खबर सार :-
नेशनल कॉन्फ्रेंस इस प्रदर्शन को जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कराने के लिए अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक अभियान बता रही है। पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन सहित विभिन्न राजनीतिक दलों से इस आंदोलन में शामिल होने की अपील की है।
खबर विस्तार : -
नई दिल्लीः जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [माकपा] ने नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला द्वारा संसद के मानसून सत्र के पहले दिन नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन का समर्थन करने की घोषणा की है। पार्टी ने सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समाज से इस प्रदर्शन में शामिल होकर राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को मजबूत करने की अपील की है।
राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग
माकपा की जम्मू-कश्मीर राज्य समिति के सचिव मोहम्मद अब्बास राथर ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, यह जम्मू-कश्मीर के सभी समुदायों और वहां के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सभी दलों और संगठनों को एकजुट होना चाहिए।
राथर ने अपने बयान में कहा कि 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-ए को निरस्त करते हुए जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्य का पुनर्गठन किया था। इसके तहत राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित कर दिया गया। उनका आरोप है कि यह निर्णय स्थानीय हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किए बिना लिया गया था।
उन्होंने कहा कि यद्यपि अनुच्छेद 370 और 35-ए को हटाने के फैसले को न्यायिक मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा जल्द से जल्द बहाल करने की दिशा में कदम उठाने की बात कही थी। राथर का कहना है कि अब तक इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है, जिससे लोगों में निराशा बढ़ रही है।
माकपा नेता ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य का दर्जा बहाल करने के बजाय केंद्र सरकार ने 12 जुलाई 2024 को अधिसूचना जारी कर 'ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स' में संशोधन किया। उनके अनुसार, इस संशोधन के बाद उपराज्यपाल को पुलिस, कानून-व्यवस्था और अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की नियुक्ति और तबादलों जैसे महत्वपूर्ण मामलों में अधिक कार्यकारी अधिकार दिए गए। उनका दावा है कि इससे निर्वाचित सरकार की शक्तियां सीमित हुई हैं और जनादेश की प्रभावशीलता प्रभावित हुई है।
विपक्ष के कई नेता आए साथ
पार्टी का कहना है कि जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन केवल जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था को मजबूत करने से भी जुड़ा हुआ है। माकपा का मानना है कि राज्य का दर्जा बहाल करने में लगातार हो रही देरी से जनता में असंतोष और बढ़ सकता है।
सूत्रों के अनुसार, फारूक अब्दुल्ला ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, द्रमुक प्रमुख एम.के. स्टालिन, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव सहित देशभर के 52 प्रमुख नेताओं को इस प्रदर्शन में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। हालांकि, इन नेताओं की भागीदारी को लेकर संबंधित दलों की ओर से आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने इस प्रस्तावित प्रदर्शन या राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय का मानना है कि फिलहाल जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए आवश्यक परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। हालांकि, इस संबंध में सरकार की ओर से कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बना हुआ है। आगामी मानसून सत्र के दौरान यह मुद्दा संसद के भीतर और बाहर प्रमुख राजनीतिक चर्चाओं में शामिल रहने की संभावना है, जबकि विभिन्न विपक्षी दल इसे लेकर सरकार पर दबाव बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
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