Zojila Tunnel strategic impact : ड्रैगन-पाकिस्तानी सेना के उड़े होश! ज़ोजिला सुरंग से दोनों मोर्चों पर एक साथ चित्त होंगे दुश्मन

खबर सार :-
Zojila Tunnel strategic impact : ज़ोजिला सुरंग के ऐतिहासिक उत्खनन का काम पूरा होने से भारतीय सेना को लद्दाख में ऑल-वेदर कनेक्टिविटी मिलने जा रही है। जानिए कैसे यह सुरंग चीन और पाकिस्तान के नापाक दोहरे मोर्चे के मंसूबों को नाकाम कर देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा गेम चेंजर साबित होने वाली है।
Zojila Tunnel strategic impact : ड्रैगन-पाकिस्तानी सेना के उड़े होश! ज़ोजिला सुरंग से दोनों मोर्चों पर एक साथ चित्त होंगे दुश्मन
खबर विस्तार : -

 Zojila Tunnel strategic impact : लद्दाख और कश्मीर के बर्फीले पहाड़ों के बीच भारत एक ऐसा नया इतिहास रच रहा है, जो आने वाले समय में दक्षिण एशिया के सैन्य और सामरिक संतुलन को हमेशा के लिए बदल कर रख देगा। केंद्र सरकार की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के दम पर ज़ोजिला दर्रे के नीचे बन रही देश की सबसे महत्वपूर्ण सुरंग का काम अब अपने सबसे निर्णायक पड़ाव पर पहुंच चुका है। हाल ही में इस महा-परियोजना के उत्खनन चरण (excavation phase) को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया, जिसने केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की गरिमामयी मौजूदगी में देश की सैन्य ताकत को एक नई और अभेद्य ऊंचाई दी है। यह सिर्फ दो दुर्गम भौगोलिक क्षेत्रों को आपस में जोड़ने वाली कंक्रीट की कोई आम नली नहीं है, बल्कि यह चीन और पाकिस्तान जैसे चालबाज पड़ोसियों के खिलाफ वास्तविक नियंत्रण रेखा और नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना की श्रेष्ठता स्थापित करने वाला एक ऐसा चक्रव्यूह है, जिसका मुकाबला करना अब दुश्मनों के बस की बात नहीं होगी।

मौसम की बेड़ियों से आजाद होगा रणनीतिक रसद मार्ग

भौगोलिक दृष्टिकोण से देखें तो लद्दाख का इलाका साल के पांच से छह महीनों तक देश के बाकी हिस्सों से पूरी तरह कट जाता है। भारी बर्फबारी (heavy snowfall) और खतरनाक हिमस्खलन के कारण 11,578 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित मौजूदा ज़ोजिला दर्रा पूरी तरह बंद हो जाता है। ऐसी स्थिति में लद्दाख में तैनात भारतीय सेना के वीर जवानों तक आपातकालीन गोला-बारूद, भारी सैन्य टैंक, मिसाइलें और राशन पहुंचाना बेहद चुनौतीपूर्ण, जोखिम भरा और खर्चीला काम हो जाता था। लेकिन अब करीब 13 किलोमीटर लंबी यह सुरंग सोनमर्ग के पास बालटाल और लद्दाख के द्रास क्षेत्र में मीनामर्ग को आपस में सीधे जोड़ देगी। इस ऐतिहासिक बुनियादी ढांचे के चालू होने के बाद, भारत के सैन्य कमांडर बिना किसी प्राकृतिक रुकावट के चौबीसों घंटे और बारहों महीने सरहद तक अपनी सीधी पहुंच बनाए रख सकते हैं।

चीन और पाकिस्तान के नापाक गठजोड़ पर करारा प्रहार

पिछले कुछ वर्षों में पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ जारी गतिरोध (border standoff) और नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की सीजफायर उल्लंघन की नापाक हरकतों ने भारत को दोहरे मोर्चे के युद्ध (two-front war) की तैयारी करने पर मजबूत किया है। सुरक्षा विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि इस बेहद संवेदनशील और पहाड़ी इलाके में युद्ध की स्थिति में जीत उसी की झोली में जाएगी, जिसकी रसद आपूर्ति और सेना की आवाजाही सबसे तीव्र होगी। वर्तमान में श्रीनगर-लेह राजमार्ग ही एकमात्र ऐसा मार्ग है जो हमारी सेना को कश्मीर घाटी से सीधे लद्दाख के मोर्चे पर भेजता है। इस नव-निर्मित सुरंग के पूरी तरह चालू होने के बाद, भारतीय सेना के भारी-भरकम साजो-सामान, तोपें और बख्तरबंद गाड़ियां बिना किसी हवाई निर्भरता के मात्र कुछ ही घंटों के भीतर अग्रिम चौकियों पर तैनात हो सकेंगी। यह त्वरित सैन्य तैनाती क्षमता (rapid military deployment capability) निश्चित रूप से बीजिंग और इस्लामाबाद के रणनीतिक योजनाकारों की रातों की नींद उड़ाने के लिए काफी है।

कारगिल युद्ध और पूर्वी लद्दाख संकट से सीख

इतिहास गवाह है कि जब भी उत्तरी सीमाओं पर तनाव बढ़ा है, ज़ोजिला मार्ग ही देश की रक्षा के लिए मुख्य जीवनरेखा साबित हुआ है। साल 1999 में जब पाकिस्तान के प्रशिक्षित घुसपैठियों ने द्रास और बटालिक की दुर्गम पहाड़ियों पर चोरी-छिपे कब्जा किया था, तब इसी दुर्गम रास्ते से बोफोर्स तोपें सीमा पर भेजी गई थीं, जिन्होंने दुश्मनों के परखच्चे उड़ा दिए थे। वहीं, साल 2020 में जब गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हिंसक झड़प हुई, तब भी सेना को लद्दाख के भीतर बहुत बड़े पैमाने पर जवानों को आपातकालीन तौर पर तैनात करना पड़ा था। उस समय सर्दियों की शुरुआत में मार्ग बंद होने का खतरा सिर पर मंडरा रहा था। इस सुरंग के निर्माण से भारत ने दुनिया को साफ संदेश दे दिया है कि अब वह सीमाओं पर किसी भी अचानक पैदा होने वाली आपात स्थिति से निपटने के लिए हर समय सौ फीसदी तैयार है।

पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया जीवन

देश की सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के साथ-साथ यह सुरंग लद्दाख के आम नागरिकों के दैनिक जीवन में भी एक युगांतकारी और सकारात्मक बदलाव लाने वाली है। सर्दियों के कड़े मौसम में जब पूरा इलाका बाकी दुनिया से अलग-थलग पड़ जाता है, तब वहां जरूरी चीजों और सब्जियों के दाम आसमान छूने लगते हैं तथा स्वास्थ्य सेवाएं बेहद दयनीय स्थिति में पहुंच जाती हैं। ऑल-वेदर रोड कनेक्टिविटी (all-weather road connectivity) मिलने से स्थानीय कश्मीरी और लद्दाखी युवाओं के लिए साल भर रोजगार के नए-नए साधन खुलेंगे। कश्मीर से लद्दाख जाने वाले देश-विदेश के साहसी पर्यटकों को अब अपनी यात्रा के लिए केवल गर्मियों के महीनों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा, जिससे वहां शीतकालीन पर्यटन (winter tourism) को भी भारी बढ़ावा मिलेगा। लद्दाख की कीमती पश्मीना, रसीली खुबानी और स्थानीय हस्तशिल्प को साल के बारह महीने देश के बड़े बाजारों तक आसानी से कम लागत में पहुंचाया जा सकेगा, जिससे स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति बेहद समृद्ध होगी।

आत्मनिर्भर भारत की इंजीनियरिंग का बेजोड़ कीर्तिमान

इतनी अत्यधिक ऊंचाई पर, जहां सर्दियों का तापमान शून्य से 30 से 40 डिग्री नीचे चला जाता है और हवा में ऑक्सीजन की कमी होती है, वहां इस तरह की विशालकाय और अत्याधुनिक सुरंग का निर्माण करना वैश्विक इंजीनियरिंग के लिहाज से किसी चमत्कार से कम नहीं है। अत्याधुनिक वेंटिलेशन सिस्टम, चौबीसों घंटे निगरानी करने वाले हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरे, आपातकालीन निकास द्वार और एडवांस लाइटिंग से लैस यह ढांचा आधुनिक आत्मनिर्भर भारत की तकनीकी प्रगति का एक जीता-जागता उदाहरण है। यह सुरंग इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि भारत अपनी संप्रभुता, अखंडता और सीमाओं की रक्षा के लिए बुनियादी ढांचे के विकास में किसी भी हद तक जाने का माद्दा रखता है। निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि यह परियोजना केवल कंक्रीट की एक सुरंग नहीं, बल्कि दोनों मोर्चों पर चालबाज दुश्मनों को एक साथ धूल चटाने की भारत की सबसे अचूक रणनीतिक चाल है।

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