खेला हो गया! ममता बनर्जी से छिड़केगा TMC का नाम और चुनाव चिह्न? 60 विधायकों के साथ चुनाव आयोग की दहलीज पर बागी गुट, गुरुवार होगा महाफैसला!
खबर सार :-
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर! 60 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे टीएमसी के बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी गुरुवार को चुनाव आयोग की फुल बेंच से मिलेंगे। जानिए क्यों खतरे में है ममता बनर्जी की पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली/कोलकाता : पश्चिम बंगाल की सियासत में इस वक्त भूचाल आया हुआ है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सुलग रही बगावत की चिंगारी अब एक बड़े सियासी विस्फोट का रूप ले चुकी है। पार्टी से बाहर किए गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाला बागी गुट अब आर-पार के मूड में है। खुद को 'बहुमत' बताने वाला यह धड़ा गुरुवार को नई दिल्ली में भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की फुल बेंच के सामने पेश होने जा रहा है। इस मुलाकात का मुख्य एजेंडा तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक चुनाव चिह्न और पार्टी के फंड पर अपना मालिकाना हक जताना है। ऋतब्रत बनर्जी ने इस बात की पुष्टि की है कि चुनाव आयोग ने उन्हें अपनी बात रखने के लिए गुरुवार का समय दिया है। दिल्ली में अपनी ताकत का अहसास कराने के लिए बनर्जी के नेतृत्व में 10 विधायकों का एक मजबूत प्रतिनिधिमंडल बुधवार शाम को ही कोलकाता से देश की राजधानी के लिए उड़ान भर रहा है।
ममता बनर्जी को पद से हटाकर खड़ा किया नया ढांचा
इस विवाद की पटकथा पिछले महीने ही लिख दी गई थी, जब 22 जून को बागी विधायकों ने एक समानांतर बैठक बुलाकर 30 सदस्यों वाली नई राष्ट्रीय कार्यसमिति (National Executive Committee) और 10 सदस्यीय उप-समिति का ऐलान कर दिया था। इस नई कमेटी से पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पूरी तरह किनारे करते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की कमान वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को सौंप दी गई थी। इस कदम के बाद से ही टीएमसी दो धड़ों में साफ बंट चुकी है। बागी गुट के वकीलों ने इस नई समिति से जुड़े सभी वैधानिक और कानूनी दस्तावेज पहले ही चुनाव आयोग को सौंप दिए हैं।
विधायकों और वोटों का अंकगणित
फिलहाल पश्चिम बंगाल विधानसभा (West Bengal Legislative Assembly) में तृणमूल कांग्रेस के कुल 80 विधायक हैं। बागी धड़े का दावा है कि उनके पाले में 60 विधायक आ चुके हैं, जबकि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के साथ महज 20 विधायक ही बचे हैं, जिसे वे 'मूल लेकिन अल्पमत' गुट कह रहे हैं। इस लड़ाई में असली पेंच निर्वाचन चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 (Symbols Order 1968) के नियमों को लेकर फंसा है। नियमों के मुताबिक, किसी भी क्षेत्रीय दल को अपना सिंबल बचाने के लिए राज्य में कम से कम 6 फीसदी वैध वोट और दो विधायकों की जरूरत होती है।
बागी नेताओं ने जो गणित बैठाया है, उसके अनुसार 60 विधायकों के पीछे करीब 48 लाख वोटर्स का समर्थन है (यदि प्रति विधायक औसतन 80 हजार वोट माने जाएं)। यह आंकड़ा चुनाव आयोग की 6 फीसदी वाली शर्त यानी लगभग 37.80 लाख वोटों की सीमा से बहुत आगे है। दूसरी तरफ, बागी गुट का तर्क है कि ममता बनर्जी के वफादार 20 विधायकों के पास इस जादुई आंकड़े तक पहुंचने लायक जनसमर्थन नहीं बचा है। इसी कानूनी आधार को ढाल बनाकर बागी गुट कल दिल्ली में तख्तापलट की आखिरी कोशिश करेगा।
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