भोपाल : मध्य प्रदेश की सियासत में मंगलवार को उस वक्त एक अभूतपूर्व भूचाल आ गया, जब राज्यसभा चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर ने कांग्रेस की इकलौती महिला प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन (Meenakshi Natarajan) का नामांकन पत्र पूरी तरह से खारिज कर दिया। इस फैसले के आते ही सूबे के राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। चुनाव मैदान में सिर्फ चार उम्मीदवार थे, जिनमें से नटराजन का पत्ता साफ होने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के तीनों उम्मीदवारों की जीत निर्विरोध तय मानी जा रही है। 18 जून को होने वाले मतदान से ऐन पहले लगे इस तगड़े झटके ने देश की सबसे पुरानी पार्टी के भीतर की गुटबाजी को भी सरेआम उजागर कर दिया है। इस पूरे घटनाक्रम को राज्य में MP Rajya Sabha Election Controversy के रूप में देखा जा रहा है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा धमाका मध्य प्रदेश सरकार के कद्दावर मंत्री और वरिष्ठ बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय ने किया है। उन्होंने मीडिया के सामने आकर दावा किया कि कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन (Meenakshi Natarajan) के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराने के लिए जरूरी गुप्त दस्तावेज खुद कांग्रेस के ही नेताओं ने बीजेपी तक पहुंचाए थे। विजयवर्गीय ने तंज कसते हुए कहा, "हमें जो कागज मिले, वो आखिर किसने दिए? इससे आप समझ सकते हैं कि आज कांग्रेस के भीतर क्या स्थिति बनी हुई है। हमारे पास तेलंगाना की अदालत से जुड़े कागज आ रहे हैं, जबकि वहां सरकार कांग्रेस की ही है। हमारे पास पहले से कोई जानकारी नहीं थी, हमें तो कांग्रेस के अपने ही लोगों ने यह गोपनीय जानकारी लाकर दी।" उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस के विधायक चाहे बेंगलुरु भागें या लंदन चले जाएं, जीत बीजेपी की ही तय थी क्योंकि देश को प्रधानमंत्री मोदी की गारंटी पर पूरा भरोसा है। वहीं बीजेपी नेता राकेश सिंह ने इस फैसले पर प्रसन्नता जताते हुए कहा कि यह सत्य की जीत है, क्योंकि उम्मीदवार ने अपने फॉर्म में गंभीर त्रुटियां की थीं।
चुनाव अधिकारी (Returning Officer) अरविंद शर्मा द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के मुताबिक, मीनाक्षी नटराजन (Meenakshi Natarajan) ने अपने नामांकन पत्र के साथ दाखिल किए जाने वाले 'फॉर्म 26' (शपथ पत्र) में जानबूझकर आधी-अधूरी जानकारी पेश की। जाँच में यह पूरी तरह सिद्ध पाया गया कि तेलंगाना की एक अदालत में उनके खिलाफ एक परिवाद (मामला) लंबित था, जिसका उल्लेख उन्होंने अपने हलफनामे में नहीं किया। कोर्ट ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए Meenakshi Natarajan को अदालत में हाजिर होने के लिए समन (समानार्थी नोटिस) भी जारी किया था। चूंकि नटराजन इस मामले में पहले ही कोर्ट के समक्ष अपना जवाब-दावा पेश कर चुकी थीं, इसलिए यह साबित होता है कि उन्हें इस कानूनी प्रक्रिया की पूरी जानकारी थी। भारत निर्वाचन आयोग के नियमों के मुताबिक, तथ्यों को छिपाना और अधूरा एफिडेविट जमा करना नामांकन रद्द करने का ठोस आधार है।
मिली जानकारी के मुताबिक, एक पूर्व कॉर्पोरेट अधिकारी ए. श्रीलता ने तेलंगाना की 'चौथे अतिरिक्त मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट' की अदालत में एक याचिका दायर कर रखी है। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि मीनाक्षी नटराजन (Meenakshi Natarajan) ने कुंभम शिवकुमार रेड्डी नाम के एक व्यक्ति को राजनीतिक संरक्षण दिया था। उक्त रेड्डी पर महिला से छेड़छाड़ और जान से मारने की धमकी देने जैसे कई गंभीर आरोप हैं। इसी मामले को आधार बनाकर बीजेपी ने चुनाव आयोग के समक्ष नटराजन के नामांकन पर तीखी आपत्ति (Objection) दर्ज कराई थी। इस कानूनी उलझन ने आखिरकार MP Rajya Sabha Election Controversy को जन्म दे दिया, जिसने कांग्रेस की रणनीति को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया।
नामांकन निरस्त होने की खबर आते ही कांग्रेस खेमे में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "देश में अब वोट चोरी से अगले स्तर पर जाकर सीधे सीट चोरी करने का खतरनाक सिलसिला शुरू हो चुका है। मीनाक्षी का पर्चा सिर्फ निरस्त नहीं हुआ, बल्कि यह सीधे तौर पर हमारे प्रजातंत्र की क्रूर हत्या है।"
वहीं दूसरी ओर, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस पूरी घटना को 'जबरन की राजनीति' (Forced Politics) करार दिया है। सिंघार ने बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा कि पार्टी एक ईमानदार और गांधीवादी महिला नेता से डर गई है। उन्होंने दलील दी कि Meenakshi Natarajan के खिलाफ कोई औपचारिक एफआईआर दर्ज नहीं हुई है, बल्कि सिर्फ अदालत का एक नोटिस मिला था। चुनाव आयोग के नियम कहते हैं कि केस दर्ज होने पर ही जानकारी देना अनिवार्य है, महज नोटिस मिलने पर नहीं। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि बीजेपी का नारा तो 'नारी वंदना' का है, लेकिन उनका असली चरित्र 'नारी अपमान' का है।
इस हाई-प्रोफाइल ड्रामे की शुरुआत मंगलवार सुबह ही हो गई थी, जब कांग्रेस ने अपनी पुरानी 'रिसॉर्ट स्टे' रणनीति के तहत अपने सभी विधायकों को एकजुट रखने के लिए भोपाल हवाई अड्डे से बेंगलुरु भेजने की तैयारी कर ली थी। लेकिन हवाई अड्डे पर ही पार्टी को भारी प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़ा और इसी उठापटक के बीच नामांकन खारिज होने की खबर आ गई। इस तरह विधायकों को बाहर भेजने की योजना भी धरी की धरी रह गई। कांग्रेस के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और कानूनी लापरवाही ने इस MP Rajya Sabha Election Controversy को और ज्यादा पेचीदा बना दिया है।
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