भारतीय वायु सेना विकसित करेगी स्वदेशी लंबी दूरी के कामिकेज ड्रोन, स्टार्टअप्स को मिलेगा बढ़ावा
खबर सार :-
भारतीय वायु सेना ने स्वदेशी लंबी दूरी वाले कामिकेज़ (एकतरफ़ा हमला करने वाले) ड्रोन विकसित करने के लिए एक प्रोजेक्ट शुरू किया है। ये ड्रोन भारतीय उद्योग के सहयोग से विकसित किए जाएंगे।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली: भारतीय वायु सेना (IAF) ने देश की रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए स्वदेशी लंबी दूरी के कामिकेज (वन-वे अटैक) ड्रोन विकसित करने की परियोजना शुरू की है। इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का उद्देश्य आधुनिक युद्ध की आवश्यकताओं के अनुरूप उन्नत मानव रहित हवाई प्रणालियों का विकास करना है, जिन्हें पूरी तरह भारत में डिजाइन, विकसित और निर्मित किया जाएगा।
स्टार्टाअप्स को मिलेगा बढ़ावा
वायु सेना ने इस परियोजना के लिए भारतीय कंपनियों के चयन के लिए सीमित निविदा (टेंडर) जारी की है। परियोजना का संचालन तमिलनाडु के कोयंबटूर के निकट सुलूर स्थित 5 बेस रिपेयर डिपो (5 BRD) द्वारा किया जाएगा, जिसे इस कार्यक्रम की नोडल एजेंसी बनाया गया है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस परियोजना में निजी उद्योगों, स्टार्टअप्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
कामिकेज ड्रोन, जिन्हें ‘लोइटरिंग म्यूनिशन’ या ‘आत्मघाती ड्रोन’ भी कहा जाता है, आधुनिक युद्ध प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। ये ड्रोन लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर कुछ समय तक मंडरा सकते हैं, दुश्मन की गतिविधियों की पहचान कर सकते हैं और उचित समय पर लक्ष्य से टकराकर विस्फोट कर सकते हैं। इस कारण इन्हें अत्यधिक सटीक और प्रभावी हथियार माना जाता है।
भविष्य में अपग्रेड होंगे ड्रोन
भारतीय वायु सेना के अनुसार, प्रस्तावित स्वदेशी ड्रोन 16,000 फीट तक की ऊंचाई पर संचालन करने में सक्षम होंगे। इन्हें दिन और रात दोनों परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकेगा, जिससे विभिन्न प्रकार के सैन्य अभियानों में इनकी उपयोगिता बढ़ जाएगी। लंबी दूरी की क्षमता के कारण ये ड्रोन दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों, कमांड सेंटरों और सामरिक संसाधनों को निशाना बनाने में सक्षम होंगे।
रक्षा मंत्रालय के निर्णय के अनुसार, इस परियोजना से विकसित होने वाली तकनीक और डिजाइन के बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) भारतीय वायु सेना के पास रहेंगे। इससे भविष्य में आवश्यकता के अनुसार प्लेटफॉर्म में तेजी से बदलाव, उन्नयन और तकनीकी सुधार किए जा सकेंगे। साथ ही विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी क्षमता का विस्तार होगा।
रक्षा मंत्री ने दिए थे संकेत
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहले भी कई मंचों से ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीकों के महत्व पर जोर दे चुके हैं। नेशनल डिफेंस इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव में उन्होंने कहा था कि भारत को ड्रोन निर्माण के क्षेत्र में वैश्विक केंद्र बनने के लिए मिशन मोड में कार्य करना चाहिए। उनके अनुसार, वर्तमान वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में ड्रोन तकनीक सैन्य शक्ति का एक महत्वपूर्ण घटक बन चुकी है।
राजनाथ सिंह ने रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान-इजराइल तनाव जैसे हालिया संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा था कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन और एंटी-ड्रोन प्रणालियों की भूमिका निर्णायक होगी। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि भारत में केवल ड्रोन असेंबली नहीं, बल्कि उसके प्रत्येक महत्वपूर्ण घटक का निर्माण भी देश के भीतर होना चाहिए।
उन्होंने कहा था कि ड्रोन के ढांचे, सॉफ्टवेयर, इंजन, सेंसर और बैटरी जैसे सभी प्रमुख हिस्सों का निर्माण भारत में होना चाहिए। इससे न केवल तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, बल्कि रक्षा उत्पादन क्षेत्र में रोजगार और नवाचार को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
वायुसेना को मिलेगी मजबूती
रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2026 तक इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (आईडेक्स) पहल के तहत 676 स्टार्टअप्स, एमएसएमई और नवाचारकर्ताओं को जोड़ा जा चुका है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत अब तक 548 अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इनमें से 58 प्रोटोटाइप को लगभग 3,853 करोड़ रुपये की खरीद स्वीकृति प्राप्त हुई है, जबकि 45 खरीद अनुबंध करीब 2,326 करोड़ रुपये के मूल्य के साथ संपन्न किए जा चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वदेशी लंबी दूरी के कामिकेज ड्रोन कार्यक्रम से भारतीय रक्षा क्षेत्र को नई तकनीकी क्षमता मिलेगी और देश की सामरिक शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। साथ ही यह परियोजना ‘आत्मनिर्भर भारत’ और स्वदेशी रक्षा उत्पादन के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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