हिमाचल में जलवायु परिवर्तन का असरः तेजी से घट रहे ग्लेशियर, जलविद्युत परियोजनाओं पर संकट
खबर सार :-
हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार, दो दशकों में 97 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा ग्लेशियरों का दायरा सिमट गया है। नारडू ग्लेशियर लगातार पतला होता जा रहा है। इसका प्रभाव नदियों के जलप्रवाह और जलविद्युत परियोजनाओं पर पड़ सकता है। वैज्ञानिक इस बदलाव का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन मानते हैं।
खबर विस्तार : -
शिमला: हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। प्रदेश की नदियां और जलविद्युत परियोजनाएं इन ग्लेशियरों पर टिकी हैं, जिस वजह से जलविद्युत क्षेत्र को लेकर नई चिंता सामने आ गई है।
एक विस्तृत अध्ययन से पता चलता है कि सतलुज बेसिन के लगभग सभी ग्लेशियर लगातार पीछे हट रहे हैं और बर्फ की चादर हर साल कम हो रही है। अगर यह सिलसिला जारी रहा, तो आने वाले सालों में नदियों के पानी के बहाव पर असर पड़ेगा, जिससे बिजली उत्पादन और पानी की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी बढ़ सकता है। यह अध्ययन सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड (SJVNL) के लिए हिमाचल प्रदेश काउंसिल फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड एनवायरनमेंट (HIMCOSTE) के तहत 'स्टेट सेंटर ऑन क्लाइमेट चेंज' ने तैयार किया था।
97 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा घटा ग्लेशियरों का दायरा
अध्ययन के अनुसार, साल 2000 में सतलुज बेसिन में ग्लेशियरों का कुल दायरा 1,481.75 वर्ग किलोमीटर था, जो 2020 तक घटकर 1,384.16 वर्ग किलोमीटर रह गया। इसका मतलब है कि दो दशकों में 97 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा ग्लेशियर का दायरा खत्म हो गया है। स्पीति, बास्पा, ऊपरी सतलुज और निचली सतलुज सभी इलाकों में ग्लेशियर कम हो रहे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि 80 प्रतिशत से ज्यादा ग्लेशियर हर साल 10 मीटर से कम की रफ्तार से पीछे हट रहे हैं।
छोटे टुकड़ों में टूट रहे हैं बड़े ग्लेशियर
वैज्ञानिक इस तेजी से हो रही प्रक्रिया की वजह बढ़ता तापमान और बर्फबारी के बदलते पैटर्न को मानते हैं। रिपोर्ट साफ करती है कि भले ही कुछ इलाकों में ग्लेशियरों की संख्या बढ़ती हुई दिख रही है, लेकिन इसका मतलब नए ग्लेशियर बनना नहीं है; बल्कि, बड़े ग्लेशियर पिघलकर छोटे टुकड़ों में बंट रहे हैं। इसी बंटवारे की वजह से ग्लेशियरों की संख्या में बढ़ोतरी दिख रही है। निचली सतलुज इलाके में ग्लेशियरों की संख्या 1,694 से बढ़कर 1,709 और स्पीति इलाके में 696 से बढ़कर 699 हो गई है। हालांकि बास्पा इलाके में ग्लेशियरों की संख्या दो दशकों से 99 पर स्थिर है, लेकिन वहां भी ग्लेशियर लगातार पीछे हट रहे हैं। अध्ययन में नारडू ग्लेशियर का भी जिक्र है, जो लगातार पतला होता जा रहा है।
ग्लेशियर घटने से नदियों के बहाव पर पड़ेगा असर
रिपोर्ट के अनुसार, हिमाचल की ज्यादातर जलविद्युत परियोजनाएं ग्लेशियर से निकलने वाली नदियों पर निर्भर हैं। हालांकि ग्लेशियरों के लगातार सिकुड़ने से शुरू में नदियों के जल स्तर में अस्थायी बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन लंबे समय में बहाव कम होने का खतरा है। इसके अलावा, नदियों में गाद (silt) का स्तर बढ़ने से जलविद्युत टर्बाइनों में टूट-फूट बढ़ेगी, जिससे रखरखाव की लागत भी बढ़ जाएगी।
कम पानी वाले मौसम में घट सकता है बिजली उत्पादन
पानी की कम उपलब्धता वाले मौसम में बिजली उत्पादन भी कम हो सकता है। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि सतलुज बेसिन का कोई भी हिस्सा जलवायु परिवर्तन के असर से अछूता नहीं है। इसलिए, ग्लेशियरों और बर्फ की चादर की लगातार निगरानी, पानी के बहाव का सटीक पूर्वानुमान और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल नई रणनीतियां बनाने की तत्काल आवश्यकता है।
कुल क्षमता का केवल आधा ही इस्तेमाल कर रहा है हिमाचल
हिमाचल प्रदेश लंबे समय से देश का 'पावर स्टेट' बनने की कोशिश कर रहा है, फिर भी उसने अपनी जलविद्युत क्षमता का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया है। राज्य की कुल अनुमानित जलविद्युत क्षमता 23,947.25 मेगावाट है, जबकि अब तक केवल 12,588.63 मेगावाट क्षमता ही विकसित की गई है—यानी कुल क्षमता का केवल 52.6 प्रतिशत ही इस्तेमाल हो रहा है।
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राज्य में अधर में लटकी हैं 54 जलविद्युत परियोजनाएं
ऊर्जा विभाग के अनुसार, राज्य में वर्तमान में 189 जलविद्युत परियोजनाएं चालू हैं, जबकि 54 परियोजनाएं या तो निर्माणाधीन हैं या विभिन्न चरणों में रुकी हुई हैं। इसके अलावा, 530 परियोजनाएं वर्तमान में मंजूरी, आवंटन या अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में फंसी हुई हैं। इनकी कुल क्षमता 7,623.61 मेगावाट है। चिनाब और सतलुज बेसिन में सबसे अधिक जलविद्युत क्षमता है। किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चंबा, कुल्लू और मंडी इस क्षेत्र के प्रमुख जिले हैं।
इन परियोजनाओं ने राज्य को अलग पहचान दिलाई
नाथपा-झाकरी, कोल डैम, पार्वती, करछम-वांगटू और ब्यास जैसी परियोजनाओं ने ऊर्जा क्षेत्र में हिमाचल को एक अलग पहचान दिलाई है। निजी क्षेत्र ने 40 परियोजनाओं के माध्यम से 2,890.51 मेगावाट क्षमता विकसित की है, जबकि केंद्रीय और संयुक्त उपक्रमों ने 13 परियोजनाओं में 8,311.73 मेगावाट क्षमता स्थापित की है। पर्यावरण और सामाजिक चिंताओं के कारण, कुल 815.40 MW क्षमता वाली 11 परियोजनाओं को छोड़ने का फैसला भी किया गया है।
'रुकी हुई परियोजनाओं को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा'
ऊर्जा विभाग के निदेशक राकेश कुमार प्रजापति का कहना है कि हिमाचल में लगभग 24,000 MW की जलविद्युत क्षमता है, जो राज्य के आर्थिक भविष्य के लिए सबसे बड़ी ताकत है। वे कहते हैं कि रुकी हुई परियोजनाओं को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा, साथ ही पर्यावरण का संतुलन बनाए रखा जाएगा और स्थानीय समुदायों के हितों की रक्षा भी की जाएगी।
FAQ
हिमाचल प्रदेश में क्यों कम हो रहे ग्लेशियर?
जलवायु परिवर्तन के कारण हिमाचल प्रदेश में बढ़ते तापमान, बर्फबारी की कमी और अत्यधिक मानवीय हस्तक्षेप की वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
ग्लेशियरों के पिघलने से क्या होगा असर?
ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों का जल स्तर प्रभावित होगा। लंबे समय में बहाव कम होने से नदियों में गाद का स्तर बढ़ेगा और जलविद्युत परियोजनाओं पर भी असर होगा।
ग्लेशियर बचाने के लिए क्या कर सकते हैं?
ग्लेशियरों को बचाने के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करना, वनों का संरक्षण करना और बेतहाशा निर्माण पर रोक लगाना जरूरी है। इसके अलावा कृत्रिम ग्लेशियर बनाना भी उपयोगी साबित हो सकता है।
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