लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन में कड़े फैसलों के लिए पहचाने जाने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अब एक ऐसे मोर्चे पर घेराबंदी शुरू की है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है। मंगलवार को लखनऊ में हुई एक हाई-प्रोफाइल बैठक में मुख्यमंत्री ने 'आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश' की दिशा में बड़े कदम उठाते हुए सरकारी तामझाम में भारी कटौती और जनता से संयम बरतने की अपील की है।
वैश्विक अस्थिरता और संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच, योगी सरकार ने ईंधन (Fuel) और सोने (Gold) की खपत पर अंकुश लगाने के लिए जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं, वे किसी 'आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक' से कम नहीं हैं। मुख्यमंत्री ने न केवल मंत्रियों और अधिकारियों के काफिलों को आधा करने का आदेश दिया, बल्कि आम जनता से भी अनावश्यक सोना न खरीदने और पेट्रोल-डीजल बचाने का आह्वान किया है।
राजधानी लखनऊ में शासन और पुलिस के आला अधिकारियों के साथ लंबी चली बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने जो सबसे पहला और बड़ा फैसला लिया, वह खुद उनके और उनके मंत्रिमंडल के 'रसूख' से जुड़ा था। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि उनके स्वयं के बेड़े, मंत्रियों और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के वाहनों के काफिले में तत्काल 50 प्रतिशत की कटौती की जाए।
अक्सर सड़कों पर सायरन बजाती गाड़ियों की लंबी कतारों को अब इतिहास बनाने की तैयारी है। सीएम ने सख्त लहजे में कहा कि काफिले में एक भी गैर-जरूरी वाहन नहीं दिखना चाहिए। यह कदम केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि बढ़ते राजकोषीय घाटे और ईंधन की बढ़ती कीमतों के बीच सरकार की गंभीरता को दर्शाता है।
यूपी की सत्ता के केंद्र से एक और अनूठी पहल सामने आई है। मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया है कि सांसद और विधायक (MP-MLA) सप्ताह में कम से कम एक दिन सार्वजनिक परिवहन (Public Transport) का उपयोग करें। यह संदेश सीधा है, जब जननायक बस या मेट्रो में सफर करेंगे, तभी आम आदमी के मन में संसाधनों के संरक्षण के प्रति चेतना जागेगी।
कोरोना काल के बाद जिस 'वर्क फ्रॉम होम' कल्चर को लोग भूलने लगे थे, योगी सरकार ने उसे ईंधन बचाने के हथियार के रूप में फिर से जीवित कर दिया है। मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक कामकाज को आधुनिक बनाने और सड़कों पर वाहनों का बोझ कम करने के लिए वर्क फ्रॉम होम को प्राथमिकता देने को कहा है।
निजी क्षेत्र की भागीदारी: औद्योगिक प्रतिष्ठानों और बड़े स्टार्टअप्स को सुझाव दिया गया है कि वे सप्ताह में दो दिन घर से काम करने की व्यवस्था लागू करें।
वर्चुअल बैठकें: अब सचिवालय और निदेशालयों में होने वाली कम से कम 50 प्रतिशत बैठकें, सेमिनार और कार्यशालाएं अनिवार्य रूप से ऑनलाइन मोड में होंगी। इससे न केवल समय बचेगा, बल्कि करोड़ों रुपये का ईंधन और प्रशासनिक खर्च भी बचेगा।
योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'संसाधन संरक्षण' के आह्वान को आगे बढ़ाते हुए राज्य के निवासियों से एक भावुक और तार्किक अपील की है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर जो अस्थिरता बनी हुई है, उसे देखते हुए हमें 'वित्तीय अनुशासन' अपनाना होगा। मुख्यमंत्री ने लोगों से आग्रह किया है कि वे अनावश्यक सोने की खरीद से बचें। भारत में सोना आयात करना अर्थव्यवस्था पर एक बड़ा बोझ होता है, और सीएम का यह बयान सीधे तौर पर विदेशी मुद्रा भंडार और घरेलू बचत को सुदृढ़ करने की कोशिश है।
ईंधन के विकल्प के रूप में सरकार अब पीएनजी (PNG), मेट्रो रेल और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) पर अपना पूरा फोकस शिफ्ट कर रही है। सरकार का मानना है कि यदि हम अपनी निर्भरता पारंपरिक ईंधन से हटाकर इन विकल्पों पर ले आते हैं, तो यूपी को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने से कोई नहीं रोक सकता।
आर्थिक मोर्चे पर केवल कटौती ही नहीं, बल्कि आय बढ़ाने के नए रास्ते भी तलाशे जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने 'विजिट माय स्टेट' (Visit My State) अभियान का शंखनाद किया है। इसका उद्देश्य उत्तर प्रदेश को न केवल धार्मिक पर्यटन, बल्कि 'डेस्टिनेशन वेडिंग' और 'इको-टूरिज्म' का भी केंद्र बनाना है। अमीर परिवारों द्वारा विदेशों में जाकर शादी करने के बढ़ते चलन के बीच योगी सरकार चाहती है कि उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहरों और महलों को विवाह स्थलों के रूप में प्रमोट किया जाए। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित होगा और राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
योगी सरकार के ये निर्देश केवल सरकारी आदेश नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव की आहट हैं। वीआईपी कल्चर पर चोट करना और जनता को बचत के लिए प्रेरित करना एक साहसी कदम है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नौकरशाही और जनप्रतिनिधि इसे कितनी ईमानदारी से लागू करते हैं। यदि उत्तर प्रदेश जैसा विशाल राज्य ईंधन और फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने में सफल रहता है, तो यह देश के अन्य राज्यों के लिए एक नजीर पेश करेगा। आने वाले दिनों में देखना दिलचस्प होगा कि लखनऊ की सड़कों पर मंत्रियों की गाड़ियां कम होने से आम आदमी के जीवन और राज्य के खजाने पर कितना सकारात्मक असर पड़ता है।
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