सोनभद्र में रिमांड याचिका खारिज, अदालत ने धारा 108 बीएनएस हटाई

खबर सार :-
सोनभद्र डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के सीनियर वकील शरद गुप्ता ने केस के सभी पहलुओं को कोर्ट के सामने रखा। जिस पर कोर्ट ने युवक पर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए दोष मुक्त कर दिया।

सोनभद्र में रिमांड याचिका खारिज, अदालत ने धारा 108 बीएनएस हटाई
खबर विस्तार : -

सोनभद्र/रॉबर्ट्सगंजः न्याय व्यवस्था का आधार तथ्यों, साक्ष्यों और विधिक प्रावधानों पर टिका होता है। भावनात्मक परिस्थितियों में लगाए गए आरोपों की सत्यता का परीक्षण न्यायालय में ही होता है, जहां अधिवक्ता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। ऐसा ही एक मामला जनपद सोनभद्र से सामने आया है, जिसने न्यायिक प्रक्रिया और निष्पक्ष सुनवाई के महत्व को पुनः रेखांकित किया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, वादिनी की पुत्री ने 10 दिसंबर 2025 को आत्महत्या कर ली थी। घटना के लगभग दो माह बाद वादिनी की ओर से थाना पिपरी में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 108, 352 एवं 351(3) के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया। मामले की विवेचना के दौरान जांच अधिकारी ने 21 फरवरी 2025 तक साक्ष्य संकलित करते हुए सुमित नामक युवक को मुख्य आरोपी मान लिया। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर जेल भेजने की कार्रवाई के उद्देश्य से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, सोनभद्र की अदालत में रिमांड के लिए प्रस्तुत किया गया।

सुनवाई के दौरान जनपद न्यायालय सोनभद्र के वरिष्ठ अधिवक्ता शरद गुप्ता ने आरोपी की ओर से प्रभावी पैरवी की। उन्होंने न्यायालय के समक्ष मामले के तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और विधिक प्रावधानों का विस्तार से विश्लेषण प्रस्तुत किया। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि धारा 108 बीएनएस के अंतर्गत लगाए गए आरोपों के समर्थन में पर्याप्त एवं ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए हैं, जिससे प्रथम दृष्टया अपराध स्थापित हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि बिना ठोस आधार के आरोपी को रिमांड पर भेजना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने पाया कि धारा 108 बीएनएस के तहत आरोप स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होता है। परिणामस्वरूप न्यायालय ने विवेचक की रिमांड याचिका खारिज कर दी तथा सुमित गुप्ता को राहत देते हुए धारा 108 बीएनएस हटाने का आदेश दिया।

यह निर्णय न केवल एक युवक के अधिकारों की रक्षा का प्रतीक है, बल्कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और संवेदनशीलता को भी दर्शाता है। यह प्रकरण इस बात को रेखांकित करता है कि अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल के प्रतिनिधि नहीं होते, बल्कि वे न्याय व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में कार्य करते हैं। अधिवक्ता शरद गुप्ता की प्रभावी और सजग पैरवी जनपद में न्याय के प्रति प्रतिबद्धता की प्रेरक मिसाल के रूप में देखी जा रही है।

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