चेन्नई: तमिलनाडु की सियासत इस वक्त उस मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहाँ हर पल समीकरण बदल रहे हैं। फिल्मी पर्दे पर असंभव को संभव करने वाले 'थलापति' विजय के लिए राजनीति का मैदान अब असली चुनौती पेश कर रहा है। विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य को एक ऐसी त्रिशंकु स्थिति में धकेल दिया है, जहाँ सत्ता की चाबी अब छोटे दलों के हाथ में है। अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी, 'तमिलगा वेत्री कझगम' (टीवीके), सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद बहुमत के जादूई आंकड़े को छूने के लिए जद्दोजहद कर रही है।
मंगलवार के बाद बुधवार को एक बार फिर विजय ने राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर से मुलाकात की। करीब 40 मिनट तक चली इस बंद कमरे की बैठक ने राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, विजय ने सरकार बनाने का अपना दावा पुरजोर तरीके से रखा है, लेकिन राजभवन का रुख स्पष्ट है, "पहले संख्या लाओ, फिर शपथ लो।" राजभवन से जारी आधिकारिक बयान में यह स्वीकार किया गया है कि विजय ने फिलहाल अपने पास बहुमत (118 सीटें) न होने की बात मानी है। 108 सीटों वाली टीवीके को कांग्रेस के समर्थन के बाद 112 का साथ तो मिल गया है, लेकिन सत्ता की कुर्सी तक पहुँचने के लिए अभी भी 6 विधायकों की दरकार है।
विजय की टीम अब उन 6 सीटों की तलाश में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। पार्टी महासचिव सीटीआर निर्मल कुमार खुद कमान संभाले हुए हैं। बुधवार को उन्होंने वामपंथी दलों के नेताओं के साथ गुप्त मंत्रणा की। वहीं, टीवीके के रणनीतिकार अरुणराज और मुस्तफा ने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के राष्ट्रीय अध्यक्ष कादर मोहिद्दीन के दरवाजे पर दस्तक दी है।
आईयूएमएल के रुख ने फिलहाल सस्पेंस बरकरार रखा है। कादर मोहिद्दीन ने विजय के लोकतांत्रिक अधिकार का सम्मान तो किया, लेकिन एक बड़ा पेच भी फंसा दिया। उन्होंने साफ कहा कि वे पिछले तीन दशकों से डीएमके गठबंधन के वफादार साथी हैं और कोई भी फैसला एम.के. स्टालिन से मशविरे के बिना नहीं लेंगे। ऐसे में सवाल यह है कि क्या स्टालिन अपने पुराने साथियों को विजय के पाले में जाने की अनुमति देंगे?
राजनीतिक जोड़-तोड़ के बीच टीवीके ने अपनी वैचारिक दिशा भी साफ कर दी है। सीटीआर निर्मल कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वे सत्ता पाने के लिए भाजपा या एनडीए गठबंधन का दरवाजा नहीं खटखटाएंगे। टीवीके का यह रुख बताता है कि विजय अपनी 'द्रविड़ियन और सेकुलर' छवि के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते, भले ही इसके लिए उन्हें विपक्ष में बैठना पड़े।
तमिलनाडु की जनता अब सांसें थामकर देख रही है कि क्या विजय उन 6 विधायकों का समर्थन जुटा पाएंगे। यदि वामपंथी और आईयूएमएल का रुख सकारात्मक रहता है, तो दक्षिण भारत में एक नए राजनीतिक युग का उदय होगा। लेकिन अगर डीएमके ने अपने सहयोगियों को बांधे रखा, तो विजय की यह कोशिश राजभवन की फाइलों तक ही सीमित रह सकती है। फिलहाल, चेन्नई की तपती धूप से ज्यादा गर्म यहाँ का सियासी तापमान है।
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