नई दिल्ली: भारत की प्रगति और औद्योगिक विकास की चमक के पीछे एक डरावना सच छिपा है। एक अंतरराष्ट्रीय शोध में यह खुलासा हुआ है कि भारत हर साल लगभग 1.566 करोड़ मीट्रिक टन खतरनाक औद्योगिक कचरा पैदा कर रहा है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में प्रदूषित स्थलों की संख्या मात्र 200 के करीब ही सिमटी हुई है। यह भारी अंतर इस बात का संकेत है कि देश का एक बड़ा हिस्सा 'साइलेंट किलर' की गिरफ्त में है, जिसकी पहचान तक नहीं हो पाई है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन ने 'एनवायर्नमेंटल डेवलपमेंट' पत्रिका में भारत की पर्यावरणीय नीतियों पर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, स्विट्जरलैंड जैसे छोटे देश की तुलना में भारत में दर्ज प्रदूषित स्थलों की संख्या न के बराबर है, जबकि यहाँ औद्योगिक कचरे का उत्पादन कई गुना अधिक है। इसका सीधा मतलब यह है कि हजारों ऐसी जगहें हैं जहाँ की मिट्टी और भूजल में सीसा, पारा, कैडमियम और घातक रसायन घुल चुके हैं, लेकिन वे आधिकारिक नजरों से ओझल हैं।
सबसे गंभीर चिंता की बात यह है कि ये अज्ञात प्रदूषित स्थल अक्सर घनी आबादी वाले क्षेत्रों के पास स्थित हैं। लोग अनजाने में इन दूषित जमीनों पर रह रहे हैं और वहां का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं। भारी धातुओं और कीटनाशकों का यह जहर धीरे-धीरे हमारी खाद्य श्रृंखला (Food Chain) में प्रवेश कर रहा है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका प्रभाव तुरंत नहीं दिखता, लेकिन भविष्य में यह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों और शारीरिक विकृतियों का बड़ा कारण बन सकता है।
शोध में पाया गया कि भारत में प्रदूषण नियंत्रण के लिए कोई एक एकीकृत प्रणाली नहीं है। कहीं जल विभाग काम कर रहा है तो कहीं मिट्टी की सुरक्षा का जिम्मा दूसरे विभाग के पास है। विभागों के बीच समन्वय की इसी कमी का फायदा उठाकर जहरीला कचरा खुले में ठिकाने लगाया जा रहा है।
वैज्ञानिकों ने इस संकट से निपटने के लिए CS-MAR (कंटैमिनेटेड साइट मॉनिटरिंग, असेसमेंट एंड रेमेडिएशन) नामक एक नया मॉडल प्रस्तावित किया है। इसके तहत पूरे देश में प्रदूषित स्थलों की डिजिटल मैपिंग, डेटा संग्रह और अंतरराष्ट्रीय मानकों (जैसे अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया) के आधार पर उनकी सफाई (Remediation) करने की सिफारिश की गई है। समय रहते अगर इन 'जहरीले धब्बों' की पहचान कर उन्हें उपचारित नहीं किया गया, तो भारत के लिए अपनी आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, मिट्टी और पानी देना एक असंभव चुनौती बन जाएगा।
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