रांचीः पहलगाम (जम्मू-कश्मीर) में दो दर्जन से अधिक पर्यटकों की हत्या को लेकर झारखंड में भी उबाल है। इस घटना पर राज्य के पहले मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी और हेमंत कैबिनेट के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू भी आमने-सामने आ गये हैं। दोनों ने एक-दूसरे पर सियासी वार किया है।
सुदिव्य कुमार सोनू ने शुक्रवार को नेपाल हाउस, रांची में हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का उनके द्वारा इस्तीफा मांगा जाना और इस पर बाबूलाल की प्रतिक्रिया को लेकर प्रेस वार्ता में अपना पक्ष रखा। कहा कि उनका बड़ा स्पष्ट मानना है कि आज की राजनीतिक जमात में तीन तरह के लोग हैं। पढे-लिखे लोग, अनपढ और कुछ कुपढ लोग। दुर्भाग्य यह है कि ये कुपढ लोगों की जमात ज्यादा दिखती है। गुरुवार के उनके बयान और भूगोल के ज्ञान पर बहुत सारी चीजें मुझसे बतायी गयीं। दरअसल, मैंने बहुत स्पष्ट कहा था कि पहलगाम की घटना पर हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू इस्तीफा दें। यह हमने इसलिए कहा था कि आजाद भारत में सार्वजनिक जीवन के लिए बहुत ऊंचे मापदंड पूर्वजों ने स्थापित किये थे। 1956 में तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दिया था। कल (गुरुवार) प्रधानमंत्री मोदीजी बिहार के जिस कार्यक्रम में बिहार के सीएम नीतीश कुमार के साथ बैठे थे, 1999 में हुई एक रेल दुर्घटना पर तत्कालीन रेल मंत्री रहते नीतीश ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दिया था। 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दिया था। पहलगाम मामले में भी ऐसा होना चाहिए था। आश्चर्य है कि इस घटना में 28 लोगों के मारे जाने के बाद पत्रकार भाईयों ने किसी पर जवाबदेही तय नहीं की। आखिर यह विफलता किसकी थी, कौन लोग इसके जवाबदेह थे। 2001 में जब संसद पर हमला हुआ था, अफजल गुरू के मामले में जम्मू-कश्मीर के जिस डीएसपी ने श्रीनगर से दिल्ली तक पहुंचाया था, आज तक उसके लिए जवाबदेही तय नहीं हो सकी। जब पठानकोट में एयरबेस पर हमला हुआ था, उस समय भी कोई जवाबदेही फिक्स नहीं हुई। जब पुलवामा में हमारी सीमा को पार करते 300 किलो आरडीएक्स के साथ आतंकवादी घुस गए, कोई जवाबदेही फिक्स नहीं हुई।
देश को यह नहीं मालूम कि वो 300 किलो आरडीएक्स देश की सीमाओं में कैसे आया। पहलगाम की घटना में 300 किलोमीटर दूर हमारी सीमा से अगर 6 आतंकवादी टहलते हुए चले आते हैं तो यह विफलता किसकी है। मैं तो यही कहना चाहता था कि अगर इस केस में किसी की जवाबदेही फिक्स नहीं हो रही है तो हमारे हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को इस्तीफा दे देना चाहिए। देश 28 शोक संतप्त परिवारों के साथ खड़ा है तो देश में राष्ट्रीय शोक की घोषणा क्यों नहीं हुई। यह राष्ट्रीय आपदा का विषय था। अब बदले हुए भारत में अब घटना की जवाबदेही फिक्स नहीं होती। नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने मेरे बयान को फूहड़ बताया। भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. रविंद्र कुमार राय के गिरिडीह में दिये गए बयान को भी बाबूलाल देखें, जिसमें उन्होंने झारखंड से अंतर्राष्ट्रीय सीमा लगे होने की बात कही थी तो रविंद्र राय को भी थोड़ा भूगोल का अध्ययन करा देते कि झारखंड की कोई सीमा अंतर्राष्ट्रीय सीमा नहीं है। पहलगाम की घटना के लिए पत्रकारों ने नेताओं की जवाबदेही तय नहीं की तो हमारे जैसे नेता पत्रकार की भूमिका में आते हैं। घटना अगर पहलगाम में घटी है तो जम्मू-कश्मीर तो केंद्र शासित प्रदेश है। वहां की आंतरिक सुरक्षा तो भारत सरकार के अधीन है तो इसके लिए महबूबा मुफ्ती (उमर अब्दुल्ला की जगह महबूबा का नाम) तो जवाब दे नहीं सकती तो सुखविंदर सिंह या भगवंत सिंह मान को जवाबदेह बनना चाहिए कि कैसे यह घटना घट गयी। भारतीय जनता पार्टी के जो मित्र सड़कों पर उतरकर आंदोलन कर रहे हैं तो वो भी जरा स्पष्ट करें कि उनका आंदोलन किसके खिलाफ है। देश की कुर्सी पर भाजपा के प्रधानमंत्री मोदी हैं, देश के सीमाओं की रक्षा की जिम्मेदारी भाजपा के रक्षा मंत्री पर है। आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी भी भाजपा के नेता और गृह मंत्री है। अगर वे फेल्योर हैं तो जवाबदेह कौन?
गौरतलब है कि गुरुवार को लोहरदगा में पहलगाम की घटना पर पत्रकारों के सवाल पर झारखंड के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने कहा था कि इसके लिए सुखविंदर सिंह सुक्खू को इस्तीफा दे देना चाहिए। उनके इस बयान पर भाजपा सहित दूसरे नेताओं ने आपत्ति जताई थी। बाबूलाल ने कहा था कि मंत्री सोनू का यह व्यंग्य उनके भीतर कूट-कूट भरे अहंकार एवं पागलपन को दर्शाता है। जब पूरा देश ही नहीं, पूरी दुनिया के लोग पहलगाम हमले को लेकर सदमे में हैं, ऐसे समय में किसी मंत्री का यह फूहड़पन शर्मनाक है और उनके इस आचरण की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है। बाबूलाल ने यह भी कहा कि वे इन्हें (सोनू) अपेक्षाकृत एक गंभीर व्यक्ति समझते थे लेकिन इनका यह आचरण देखकर झारखंडवासियों का सिर शर्म से झुक गया है।
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