Caste Census 2026: भारत के इतिहास में एक बड़ा कदम उठाया गया है। 1947 के बाद पहली बार, केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना की मंजूरी दे दी है, जो देश की सामाजिक संरचना को बेहतर ढंग से समझने के लिहाज़ से बेहद अहम मानी जा रही है। कई सालों से इस मुद्दे पर बहस होती रही, कहीं समर्थन, तो कहीं विरोध। लेकिन अब तस्वीर साफ हो चुकी है। जातीय जनगणना दो चरणों में कराई जाएगी।
पहला चरण शुरू होगा 1 अक्टूबर 2026 से, और इसमें शामिल होंगे भारत के चार पहाड़ी राज्य:
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर।
दूसरा चरण 1 मार्च 2027 से शुरू होगा, जिसमें देश के बाकी हिस्सों को शामिल किया जाएगा।
जातियों को जानने का अधिकार देश को है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया। इस जनगणना को केवल आंकड़ों का संग्रह भर नहीं, बल्कि समाज की पारदर्शिता और विकास की बुनियाद के रूप में देखा जा रहा है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने जानकारी दी कि यह कदम इसलिए भी जरूरी था क्योंकि अब तक जातियों की कोई ठोस और आधिकारिक जानकारी नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस सरकारों ने अक्सर जाति जनगणना का विरोध किया, और उसकी जगह सर्वेक्षण करवाए जो अक्सर राजनीतिक मकसद से किए गए।
सरकार की योजना के अनुसार, जनगणना 2027 की पहली तारीख (1 मार्च 2027) को संदर्भ बिंदु मानकर की जाएगी। वहीं पहाड़ी राज्यों में 1 अक्टूबर 2026 को यह आधार तिथि होगी, क्योंकि वहां की जलवायु और बर्फबारी जनगणना को प्रभावित कर सकती है। जनगणना अधिनियम, 1948 और जनगणना नियम, 1990 के अनुसार यह प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होगी — ठीक वैसे ही जैसे 2011 में हुई थी, जो पिछली जनगणना थी।
2021 में अगली जनगणना की योजना थी और उसकी सारी तैयारियां भी पूरी हो चुकी थीं, लेकिन कोविड-19 महामारी ने सब रोक दिया। अब जाकर, 2025 में इसकी अधिसूचना जारी होने वाली है, और 2026-27 में यह सपना साकार होगा। जातिगत जनगणना सिर्फ आंकड़े नहीं, यह समाज की उस बुनियाद को देखने का मौका है, जो अब तक दस्तावेज़ों में अधूरी रही। इसमें पारदर्शिता, सच्चाई और भविष्य की योजनाओं का आधार छिपा है। सरकार से उम्मीद है कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष, व्यापक और समावेशी होगी।
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