रोहतास में युवा इतिहासकारों की राष्ट्रीय संगोष्ठी, भारतीय इतिहास-लेखन की परंपरा पर हुआ मंथन

खबर सार :-

रोहतास के गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय में युवा इतिहासकारों की दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। भारतीय इतिहास-लेखन की परंपरा, स्रोत और शोध पद्धति पर विमर्श हुआ।
इतिहास भारतीय ज्ञान परंपरा में 'पंचम वेद' है: डॉ.बालमुकुंद पांडे

खबर विस्तार : -

रोहतास: इतिहास संकलन समिति, दक्षिण बिहार के आयोजक दल और माधव संस्कृति न्यास, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में ‘इतिहास-लेखन की भारतीय परंपरा’ विषय पर युवा इतिहासकारों की दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम रोहतास जिले के जमुहार स्थित देवमंगल सभागार, गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय में संपन्न हुआ।

संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय इतिहास-लेखन की परंपरा, उसकी वैचारिक दृष्टि, स्रोत-परंपरा और पद्धतिगत विशेषताओं पर युवा इतिहासकारों के बीच विद्वत विमर्श को बढ़ावा देना रहा। आयोजन के दौरान शोध और इतिहास-लेखन के क्षेत्र में नए आयामों तथा दृष्टिकोणों पर भी चर्चा की गई। आयोजकों के अनुसार, देश के विभिन्न प्रांतों से करीब 600 प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में सहभागिता की।

भारतीयता को महत्वपूर्ण आधार बताया

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता और अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडे ने अपने संबोधन में विद्वानों, आयोजकों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय परिवेश से जुड़कर ही बड़े स्तर के कार्यों की आधारभूमि तैयार होती है। उन्होंने भारतीयता की भावना को इतिहास-साधना का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए भारतीय समाज की सांस्कृतिक और सभ्यतागत निरंतरता पर जोर दिया। उनके अनुसार, प्राचीन काल से भारत ज्ञान, चिंतन, दर्शन, विमर्श और बौद्धिक परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। डॉ. पांडे ने इतिहास-लेखन में औपनिवेशिक और विकृत दृष्टिकोण से जुड़े विषयों पर भी चर्चा की। उन्होंने इतिहासकार भगवत दत्त की पुस्तकों के अध्ययन का आग्रह किया। उन्होंने इतिहास संकलन से जुड़े विभिन्न प्रकल्पों का उल्लेख करते हुए युवा शोधकर्ताओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने कहा कि युवा इतिहासकार शोध और इतिहास-लेखन को नई दिशा देने के साथ भारतीय परंपराओं, मानवीय मूल्यों और आदर्शों को समाज के सामने व्यापक रूप से रख सकते हैं। उन्होंने इतिहास के अध्ययन को अतीत के संकलन तक सीमित न रखते हुए उसके सामाजिक प्रभाव और तात्विक मूल्यों को समझने पर जोर दिया।

विकसित भारत 2047 से जोड़ा इतिहास अध्ययन

डॉ. बालमुकुंद पांडे ने भारतीय इतिहास और संस्कृति की समृद्ध परंपरा के अध्ययन तथा उसके उन्नयन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य में सक्रिय और रचनात्मक योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने युवा शोधकर्ताओं से इतिहास के विभिन्न स्रोतों और आयामों पर गंभीर अध्ययन करने तथा शोध के माध्यम से इतिहास-लेखन की परंपरा को आगे बढ़ाने की अपील की।

बिहार के मंत्रियों ने भी किया संबोधन

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि बिहार सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री संजय सिंह टाइगर ने कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने इतिहास को भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रकाश-स्तंभ बताते हुए भारतीय इतिहास-लेखन की परंपरा को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। विशिष्ट अतिथि बिहार सरकार के बेसिक शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने भी संबोधित किया। उन्होंने इतिहास-लेखन में भारतीयता की भावना को महत्वपूर्ण बताया। अपने संबोधन में उन्होंने इतिहास के पुनर्लेखन के संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका और उपादेयता का उल्लेख किया।

इतिहास और भूगोल के संबंध पर चर्चा

सारस्वत अतिथि प्रोफेसर (डॉ.) कामेश्वर नाथ सिंह, कुलगुरु, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने इतिहास और भूगोल के बीच गहरे संबंध पर चर्चा की। उन्होंने दोनों विषयों को परस्पर पूरक बताते हुए कहा कि एक के बिना दूसरे का अध्ययन अधूरा रह जाता है। उन्होंने शिक्षा के माध्यम से आदर्श व्यक्तित्वों के निर्माण पर भी जोर दिया और इतिहास तथा भूगोल के समन्वित अध्ययन की आवश्यकता बताई।

युवा इतिहासकारों की भूमिका पर जोर

संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रोफेसर (डॉ.) ईश्वर शरण विश्वकर्मा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना ने की। उन्होंने इतिहास-लेखन के उन्नयन में युवा इतिहासकारों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया और भारतीय ज्ञान परंपरा में इतिहास के महत्व पर प्रकाश डाला। संगोष्ठी के संरक्षक गोपाल नारायण सिंह ने प्रतिभागियों और अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने इतिहास में शोध के लिए बहुविषयक उपागम अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने इतिहास को नए आयाम देने और शोध के माध्यम से समाज में विवेकपूर्ण तरीके से इतिहास के प्रसार की आवश्यकता बताई।

देशभर से जुटे शोधकर्ता

कार्यक्रम में अतिथियों का परिचय और स्वागत भाषण डॉ. राम प्रकाश शर्मा ने दिया। उन्होंने उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों का परिचय कराया। संगोष्ठी को राष्ट्रीय युवा इतिहासकार प्रमुख डॉ. विकास कुमार सिंह ने भी संबोधित किया और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन दिल्ली प्रांत के महासचिव डॉ. निर्मल पांडे ने किया। आयोजन में दिल्ली प्रांत से डॉ. नरेंद्र शुक्ला, डॉ. प्रदीप कुमार उपाध्याय, डॉ. सत्यप्रकाश, डॉ. कौशलेंद्र, डॉ. पीयूष मिश्रा और डॉ. वैभव समेत विभिन्न प्रांतों से आए शोधकर्ताओं और इतिहासकारों ने हिस्सा लिया। आयोजकों के अनुसार, करीब 600 प्रतिभागियों की सहभागिता वाले इस आयोजन में भारतीय इतिहास-लेखन की परंपरा, शोध पद्धति और युवा इतिहासकारों की भूमिका से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श हुआ।

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