Railway Engine : उबलते केबिन, रेंगती सांसें: 55 डिग्री की भट्टी में तपने को मजबूर भारतीय रेल के सारथी, देशव्यापी 'मुंडी गरम' आंदोलन से हिला प्रशासन

खबर सार :-
Railway Engine :  भीषण गर्मी में भारतीय रेलवे के इंजन (Railway Engine) चालकों के लिए बॉयलर बन गए हैं। 55 डिग्री के केबिन तापमान, बीमारियों और सुविधाओं की कमी के खिलाफ लोको पायलटों ने देशव्यापी 'मुंडी गरम' आंदोलन शुरू कर दिया है।

Railway Engine : उबलते केबिन, रेंगती सांसें: 55 डिग्री की भट्टी में तपने को मजबूर भारतीय रेल के सारथी, देशव्यापी 'मुंडी गरम' आंदोलन से हिला प्रशासन
खबर विस्तार : -

 झांसी: भारतीय रेलवे (Indian Railways) को देश की जीवनरेखा कहा जाता है, लेकिन इस जीवनरेखा को रफ्तार देने वाले लोको पायलट (Loco Pilots) और गार्ड इन दिनों खुद अपनी जिंदगी की सबसे कठिन जंग लड़ रहे हैं। उत्तर और मध्य भारत में आसमान से बरसती आग ने जहां आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, वहीं लोहे की पटरियों पर दौड़ने वाले रेलवे इंजन (Railway Engine) चालकों के लिए चलते-फिरते 'बॉयलर' साबित हो रहे हैं। भीषण गर्मी (Extreme Heat) के इस मौसम में इंजनों के भीतर का तापमान इस कदर बढ़ गया है कि चालकों और गार्डों के स्वास्थ्य पर एक बेहद गंभीर संकट (Health Crisis) मंडराने लगा है।

हैरान करने वाली बात यह है कि जब बाहर का पारा 42 से 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास होता है, तब बंद पड़े लोहे के इन इंजनों के भीतर का तापमान बाहर के वातावरण से लगभग 5 से 10 डिग्री अधिक हो जाता है। दोपहर के समय कई इंजनों में यह तापमान 50 से 55 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जो किसी भी सामान्य इंसान के काम करने के लिए पूरी तरह से अमानवीय और जानलेवा है।

 'फर्नेस' में तब्दील होते आधुनिक रेल इंजन

रेलवे के विभिन्न मंडलों से आ रही रिपोर्ट्स और खुद चालकों की आपबीती इस बात की गवाही देती है कि सुबह 10:00 बजे से लेकर शाम 6:00 बजे तक का समय किसी यातना से कम नहीं होता। एक वरिष्ठ लोको पायलट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "विद्युत और डीजल इंजन पूरी तरह से भारी लोहे और स्टील से बने होते हैं। जब ये धूप में लगातार दौड़ते हैं, तो इनकी बॉडी सूरज की गर्मी को सोख लेती है। इसके ऊपर से इंजन के भीतर लगी भारी मशीनों और मोटरों के चलने से जो आंतरिक ऊष्मा पैदा होती है, वह केबिन को एक बंद भट्टी (Furnace) बना देती है।"

हैरानी की बात यह है कि इंजन में लगी मशीनों को ठंडा रखने के लिए तो बड़े-बड़े वैक्यूम और कूलिंग सिस्टम (Cooling Systems) लगाए गए हैं, जो मशीनों का तापमान तो नियंत्रित कर लेते हैं, लेकिन उसी गर्म हवा को केबिन के अंदर ही फेंकते हैं। नतीजतन, मशीनों की सेहत तो ठीक रहती है, पर उन्हें चलाने वाले ड्राइवरों के शरीर पूरी तरह झुलस जाते हैं। रेलवे प्रशासन ने कुछ नए इंजनों में एयर कंडीशनर (Air Conditioners) लगाने का दावा जरूर किया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश इंजनों में आज भी एसी नहीं हैं। चालकों का कहना है कि जिन गिने-चुने इंजनों में एसी लगे भी हैं, वे इस भीषण गर्मी में पूरी तरह हांफ जाते हैं और ठंडी हवा के बजाय केवल गर्म हवा के थपेड़े फेंकते हैं।

 बीमारियों का घर बन रही है लोको चालकों की जिंदगी

इस दमघोंटू और अत्यधिक गर्म माहौल में लोको पायलटों और गार्डों को लगातार 8 से 12 घंटे तक ड्यूटी करनी पड़ती है। इतने लंबे समय तक अत्यधिक तापमान और पसीने में सराबोर रहने के कारण रेल कर्मियों में कई गंभीर बीमारियां घर कर रही हैं। चिकित्सकों और रेलवे स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लोको पायलटों में हाई ब्लड प्रेशर (High Blood Pressure), अनियंत्रित शुगर और बहरेपन की समस्या अब बहुत आम हो चुकी है।

चिंताजनक पहलू यह है कि अब सीनियर स्टाफ ही नहीं, बल्कि युवा लोको पायलट भी बहुत तेजी से इन गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। लगातार पसीना बहने और केबिन में हवा का वेंटिलेशन सही न होने के कारण कर्मियों को गंभीर त्वचा रोग (Skin Diseases) और डिहाइड्रेशन का सामना करना पड़ रहा है।

इसके अलावा, इंजनों में आज के आधुनिक दौर में भी टॉयलेट या बाथरूम की कोई व्यवस्था नहीं है। 8 से 12 घंटे की लगातार ड्यूटी के दौरान शौच की व्यवस्था न होने से पुरुष कर्मचारियों को तो परेशानी होती ही है, लेकिन महिला लोको पायलटों (Female Loco Pilots) के लिए यह स्थिति किसी नारकीय अनुभव जैसी हो जाती है। पानी की कमी और लंबे समय तक यूरिन रोकने के कारण महिला स्टाफ में यूटीआई (UTI) और किडनी से जुड़ी बीमारियों का ग्राफ तेजी से बढ़ा है।

 स्टूल जैसी सीट पर 12 घंटे का सफर

लोको पायलटों की शिकायत सिर्फ तापमान को लेकर ही नहीं है, बल्कि केबिन के भीतर के बुनियादी ढांचे को लेकर भी है। ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (AILRSA) के पदाधिकारियों का कहना है कि इंजनों में बैठने के लिए दी गई सीटें किसी साधारण, बिना बैकरेस्ट वाले लोहे के स्टूल जैसी होती हैं। इन सीटों पर बैठकर लगातार 12 घंटे तक ध्यान केंद्रित रखना और रीढ़ की हड्डी को सीधा रखना शारीरिक रूप से एक दर्दनाक प्रक्रिया है।

तापमान के साथ-साथ केबिन के भीतर चलने वाली छह बड़ी मोटरों की गड़गड़ाहट और कानों को बहरा कर देने वाला शोर लोको पायलटों की मानसिक और शारीरिक सहनशक्ति की कड़ी परीक्षा लेता है। यही कारण है कि देश का रेल चालक मानसिक तनाव और भारी शारीरिक थकान के दौर से गुजर रहा है, जिससे रेल सुरक्षा पर भी अप्रत्यक्ष रूप से असर पड़ने का खतरा बना रहता है।

 आक्रोश का विस्फोट: राष्ट्रव्यापी 'मुंडी गरम' आंदोलन

प्रशासन की इस लंबी उदासीनता और बदहाल कार्यदशाओं के खिलाफ अब रेल कर्मचारियों का सब्र का बांध टूट गया है। ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (All India Loco Running Staff Association) के राष्ट्रव्यापी आह्वान पर देश भर के विभिन्न मंडलों में रेल चालकों और सहायक पायलटों ने एसी लोको शेड के सामने एकत्रित होकर एक अनोखा 'मुंडी गरम' प्रदर्शन किया।

इस प्रदर्शन के दौरान कर्मचारियों ने रेलवे प्रशासन की तानाशाही और लचर व्यवस्था के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। झांसी मंडल में भी बड़ी संख्या में रनिंग स्टाफ ने इस आंदोलन में हिस्सा लिया और अपनी मांगों को लेकर वरिष्ठ मंडल विद्युत अभियंता को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा।

एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने साफ शब्दों में कहा कि भारतीय रेलवे के पास लगभग 15,000 से अधिक रेल इंजन हैं, लेकिन इनमें से मुट्ठी भर इंजनों को छोड़कर अधिकांश आज भी बिना एसी के चल रहे हैं। रेल कर्मियों ने प्रशासन के सामने निम्नलिखित प्रमुख मांगें रखी हैं:

  •  शत-प्रतिशत वातानुकूलन: भारतीय रेल के सभी छोटे-बड़े लोको केबिनों को अविलंब एअर कंडीशनर (AC) से लैस किया जाए।
  •  शौचालय की व्यवस्था: इंजनों के भीतर ही चालकों और विशेषकर महिला कर्मचारियों के लिए आधुनिक बायो-टॉयलेट की व्यवस्था सुनिश्चित हो।
  •  आरामदायक सीटें: केबिनों में स्टूल जैसी आउटडेटेड सीटों को हटाकर एर्गोनोमिक और आरामदायक सीटें लगाई जाएं।
  •  सुरक्षा और तकनीक: केबिन के अंदर से ही सभी सिग्नल संकेत स्पष्ट देखने की आधुनिक व्यवस्था की जाए। इसके साथ ही टूलबॉक्स, जीपीएस आधारित आरटीएस (GPS based RTS) और एफएसडी (FSD) सिस्टम लगाया जाए ताकि ड्राइवरों का मानसिक तनाव कम हो सके।
  •  एकसमान उपकरण व्यवस्था: सभी रेल इंजनों में सुरक्षा उपकरण एक समान और निश्चित स्थान पर ही स्थापित किए जाएं ताकि आपातकाल में समय न गंवाना पड़े।

रेलवे कर्मचारियों के इस तीखे रुख ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि प्रशासन ने जल्द ही इन बुनियादी सुविधाओं और स्वास्थ्य संकट पर ध्यान नहीं दिया, तो आने वाले दिनों में यह शांतिपूर्ण आंदोलन रेल चक्का जाम जैसे उग्र रूप में बदल सकता है। अब गेंद पूरी तरह से रेल मंत्रालय के पाले में है।

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