आवारा पशुओं के खिलाफ नगर निगम का अभियान जारी, जलभराव पर ध्यान नहीं

खबर सार :-

पिछले दिन की बारिश के बाद मंगलवार को भी नगर निगम के पशु कल्याण विभाग ने शहर में आवारा पशुओं को पकड़ने का अभियान जारी रखा। चेहल्लुम को देखते हुए विभाग की कुछ गाड़ियों और टीमों को निर्धारित मार्ग पर लगाया गया।
बारिश से बस्ती में भर रहा पानी, नगर निगम कर्मचारी पकड़ रहे पशु

खबर विस्तार : -

लखनऊः पिछले दिन की बारिश के बाद मंगलवार को भी नगर निगम के पशु कल्याण विभाग ने शहर में आवारा पशुओं को पकड़ने का अभियान जारी रखा। चेहल्लुम को देखते हुए विभाग की कुछ गाड़ियों और टीमों को निर्धारित मार्ग पर लगाया गया। र्किर्मयों का कहना है कि आवारा पशुओं के कारण जुलूस या आवागमन में किसी तरह की बाधा न आए। वहीं, अन्य टीमों ने शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में अभियान चलाकर कुल 35 पशुओं को पकड़ा है। लेकिन जलनिकासी का काम धीमा पड़ गया। पशु कल्याण विभाग की टीम ने इंदिरा नगर, अलीगंज, निशातगंज, गोमती नगर, विभूति खंड और गीतापल्ली सहित विभिन्न क्षेत्रों में अभियान चलाया और बताया कि कुल 35 पशुओं को पकड़ा गया।

 लखनऊ नगर निगम ने नगर निगम सीमा के सभी पशुपालकों को चेतावनी भी दी है। उनका कहना है कि लोग अपने पशुओं को खुले में न छोड़ें। सड़क या सार्वजनिक स्थान पर पशु घूमते पाए जाने पर संबंधित पशुपालक से जुर्माना वसूला जाएगा। इसके साथ ही नियमानुसार कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी। नगर निगम की ओर से कहा गया है कि यदि खुले छोड़े गए किसी पशु द्वारा किसी व्यक्ति पर हमला करने का मामला सामने आता है, तो संबंधित पशुपालक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। 
पषु कल्याण विभाग नहीं लेता जिम्मेदारी

नगर निगम हर साल करोड़ों रूपये शहर को साफ करने में खर्च करता है। ज्यादातर नालियां बारिश के समय जवाब दे जाती हैं। इनमें कई एरिया ऐसे हैं, जहां पशुओं का गोबर नाली में बहा दिया जाता है। इन पर निगम कार्रवाई नहीं करता है। सैकडो की सख्या में पशु सुबह दूध निकालकर छोड़ दिए जाते हैं। यदि इन पर कार्रवाई हो तो बारिश के समय जलभराव न हो। 

जब जलभराव होता है तो भीगते हैं कर्मचारी 

नालियों में गोबर भरने से यह बंद हो जाती हैं। इनकी सफाई भी कम ही हो पाती है। अब बस्ती में पानी भरने लगा तब जल निकासी की जगह पषु पकड रह रहे हैं। लाइसेंस के नियम का पालन नहीं करते नगर निगम हर साल पषुओं को पकड़ने में हजारों रूपये खर्च करता है। प शु पालकों से टैक्स भी लेता है। लेकिन यह निगरानी नहीं की जाती है कि लाइसेंस बनवाने वाले के पास कितने पषु हैं? उनके पास जगह कितनी है और वह कितने पषुओं के लाइसेंस बनवा रहे हैं। 

मौका मुआयना भी नहीं करते

अधिकारी या कर्मचारी कभी पशुपालकों के घर जाकर यह नहीं देखते हैं कि उनके घर पर कितने जानवर हैं। उन्होंने लाइसेंस कितने का बनवाया था। पषु कहीं सड़क पर तो नहीं घूम रहे? क्योंकि अधिकतर लोग ऐसे हैं जो सुबह दूध निकाल लेते हैं, उसके बाद छोड़ देते हैं। शाम को पशु खुद ही घर पहुंच जाता है। इसी तरह कई लोग ऐसे भी हैं जो अधिकारियों के करीबी हैं। या पशुपालक पार्षदों के करीबी हैं, इस कारण उन पर कार्रवाई नहीं हो पाती है। पिछले साल सदन में ऐसी बात उठी भी थी, जिसमें अपन नगर आयुक्त ने कहा था कि हम अगर कार्रवाई कर दें तो माननीय आप लोग कल ही जानवर छुड़ाने पहुंच जाएंगे।

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