सरकारी सिस्टम की 'अंधेरी' रिपोर्ट: मर चुके कांस्टेबल को आया 'स्वस्थ' होने का मैसेज
खबर सार :-
इलाज के 42 दिन बाद कांस्टेबल की मौत आयुष्मान भारत योजना के पोर्टल ने उसे 'स्वस्थ' बताकर मैसेज भेजा। एक सरकारी चूक ने पीड़ित परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया।
खबर विस्तार : -
Chhattisgarh : किसी भी परिवार के लिए अपने प्रियजन को खोना दुनिया का सबसे बड़ा दुख होता है। लेकिन कल्पना कीजिए कि उस सदमे से उबरने की कोशिश कर रहे परिवार के मोबाइल पर एक मैसेज आए कि उनका अपना 'स्वस्थ होकर घर लौट रहा है'। यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की बेरुखी और कांस्टेबल की मौत आयुष्मान भारत के डेटाबेस में दर्ज होने की प्रक्रिया में हुई भयानक लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण है। जशपुर जिले में देवनारायण राम के परिवार के साथ जो हुआ, वह केवल एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का चेहरा है।
42 दिन बाद 'स्वस्थ' होने का मैसेज
देवनारायण राम ने 30 जून को दुनिया को अलविदा कह दिया था, जिसका प्रमाण पत्र भी अस्पताल ने जारी किया था। लेकिन 10 अगस्त को उनकी पत्नी सीमा कुजूर के फोन पर टपके उस मैसेज ने जख्मों को फिर से हरा कर दिया। मैसेज में आयुष्मान भारत योजना के तहत उनकी 'स्वस्थ वापसी' पर बधाई दी गई थी। असल में, कांस्टेबल की मौत आयुष्मान भारत के सिस्टम में दर्ज होने के बजाय, अस्पताल के ऑपरेटर ने हफ्तों बाद 'क्लेम क्लोजर' किया, जिससे मशीन ने पुराने रिकॉर्ड को अपडेट कर डिस्चार्ज का मैसेज स्वतः भेज दिया।
जवाबदेही के नाम पर महज खानापूर्ति
अस्पताल प्रशासन ने अपनी गर्दन बचाने के लिए एक डेटा एंट्री ऑपरेटर को हटाकर पल्ला झाड़ लिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक कर्मचारी को हटा देने से उस परिवार का दुख कम हो जाएगा? कांस्टेबल की मौत आयुष्मान भारत पोर्टल पर सही समय पर दर्ज क्यों नहीं हुई? यह घटना उन तमाम आदिवासियों और आम नागरिकों के मन में डर पैदा करती है जो इस योजना के भरोसे अपना इलाज करवाते हैं। यदि पोर्टल पर दर्ज जानकारी का आधार ही गलत होगा, तो आम आदमी की सुरक्षा का दावा खोखला साबित होगा।
मानवीय संवेदनाओं का कोई पैकेज नहीं
अस्पताल ने अपने स्पष्टीकरण में आंकड़ों का खेल पेश किया। 16,700 रुपये का पैकेज और बचे हुए 4.74 लाख रुपये का हिसाब बताने से पहले शायद अधिकारी यह भूल गए कि इंसान की जिंदगी किसी फाइल या बजट पैकेज से कहीं ज्यादा कीमती होती है। कांस्टेबल की मौत आयुष्मान भारत की फाइलों में एक क्लर्क की देरी का शिकार होकर रह गई। सिस्टम के लिए शायद यह सिर्फ एक 'क्लोज्ड क्लेम' था, लेकिन एक परिवार के लिए यह उनके अपनों की यादों का अपमान है। इस घटना ने एक बार फिर साबित किया है कि तकनीकी प्रगति अगर मानवीय संवेदनाओं के साथ नहीं जुड़ी है, तो वह केवल एक मशीन बन कर रह जाती है।
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