MP: पांढुर्णा और सावरगांव के ग्रामीणों के बीच पथराव, गोटमार मेले की परंपरा में 1300 से ज्यादा घायल
खबर सार :-
मध्य प्रदेश के पांढुर्णा जिले में शुक्रवार को पारंपरिक गोटमार मेले का आयोजन हुआ। इसमें जाम नदी के दोनों किनारों पर बसे पांढुर्णा और सावरगांव के लोगों ने परंपरा के नाम पर एक-दूसरे पर जमकर पथराव किया। 1300 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं।
खबर विस्तार : -
छिंदवाड़ा: मध्य प्रदेश के पांढुर्णा जिले में मेले का आयोजन में पत्थरबाजी की जाती है। इसमें करीब 1300 लोग घायल हुए हैं। हर साल लगने वाले आयोजन को आस्था से जोड़कर देखा जाता है। इसमें पुलिस और प्रशासन के अलावा राजनीतिक भागीदारी भी रहती है। सवाल यह है कि बलि दी जाने की प्रथा हत्या से जुड़ी है तो फिर यह खूनखराबा को आस्था से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है?
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गोटमार मेला करीब 300 साल से लगता आ रहा
पांढुर्णा जिले में शुक्रवार को पारंपरिक गोटमार मेले का आयोजन हुआ। इसमें जाम नदी के दोनों किनारों पर बसे पांढुर्णा और सावरगांव के लोगों ने परंपरा के नाम पर एक-दूसरे पर जमकर पथराव किया। इस भीषण पत्थरबाजी में 1326 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। इनमें से आठ लोगों को गंभीर हालत में नागपुर रेफर किया गया है।
जानकारी के अनुसार, पांढुर्णा में परंपरा के अनुसार गोटमार मेला करीब 300 साल से लगता आ रहा है।
शुक्रवार को सुबह 11 बजे पूजा-अर्चना की गई
इसी परंपरा का पालन करते हुए शुक्रवार को सुबह 11 बजे पूजा-अर्चना की गई। गोटमार मेले की शुरुआत की प्रथा में पूजा-अर्चना को स्थान देने के बाद बड़ी संख्या में लोग चंडी माता मंदिर और जाम नदी में गाड़े गए झंडे की पूजा करते हैं। इस बार भी जाम नदी में झंडा लगाए जाने के बाद पांढुर्णा और सावरगांव के गोटमार खिलाड़ी आमने-सामने आ गए। मेले में यह प्रथा पारंपरिक मानी जाती है। दोनों ओर से एक-दूसरे पर पत्थरबाजी शुरू कर दी गई।
जाम नदी के बीच लगा झंडा काट दिया गया
शाम तक पांढुर्णा पक्ष के युवक ने कुल्हाड़ी से जाम नदी के बीच लगा झंडा काट दिया। इसके साथ ही झंडा चंडी माता मंदिर पहुंचने बाद खेल का समापन कर दिया गया। इस दौरान यहां झंडा काटने की प्रथा भी है। इस बार इस मेले में तीन युवक टिन के नीचे दब गए। पत्थरबाजों ने उनकी परवाह नहीं की और जमकर पत्थरी करते रहे। मेले में इस खूनी खेल का वीडियो भी बनाते रहे।
कई लोगों के सिर फूटे और हड्डियां टूटीं
देर शाम तक चले इस पारम्परिक खेल में करीब 1326 से ज्यादा लोग घायल हो चुके थे। ऐसे भी कई लोग हैं, जिनके सिर फूटे और हड्डियां टूटीं। पत्थरबाजी में सावरगांव के 33 वर्षीय नितिन भादे का पैर टूट गया। 30 वर्षीय संजय धारपुरे के सिर और पैर में काफी चोट आई है। कैलाश नंदू साहू के सिर, कमर और पैर में चोट लगी। जीवन सलामे भी गंभीर घायल हुए हैं। पांढुर्णा के सचिन हाटेकर का भी पैर टूटा। प्रीतम योगेश राउत सिर और सीने में चोट लगने से जख्मी है। इन सभी आठ घायलों को नागपुर रेफर किया गया है।
कांग्रेस विधायक भी पत्थरबाजी में दिखे
इस मेले की परंपरा का निर्वहन करते हुए पांढुर्णा से कांग्रेस विधायक निलेश उईके भी पत्थरबाजी में नजर आए। पांच साल के बच्चे योगेश मरावी का पत्थर लगने से सिर फूट गया। बच्चे के परिजन उसे लेकर महाराष्ट्र के मोवाड़ से आए थे। इन सभी घायलों के इलाज के लिए मेला क्षेत्र में सात अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र बनाए गए थे, उनमें इलाज किया जा रहा है। ज्यादा घायल लोगों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। बता दें कि प्रशासन ने भी यहां मेले में व्यवस्थाएं दी थी। गंभीर मरीजों को नागपुर के बड़े अस्पतालों में रेफर किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग ने 44 डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई थी। मेले में 22 एंबुलेंस तैनात की हैं।
22 एंबुलेंस, 700 से ज्यादा पुलिसकर्मी रहे
पांढुर्णा कलेक्टर नीरज कुमार वशिष्ठ का कहना है कि यहां की परंपरा है कि गोटमार मेले में पत्थरबाजी हो। सरकारी स्तर पर हम लोगों ने व्यापक तैयारियां की थी। पत्थरबाजी में घायल होने वाले लोगों के लिए 22 एंबुलेंस और 700 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। किसी प्रकार के गोफन और धारदार हथियार के लिए अनुमति नहीं दी गई। किसी प्रकार से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था में बाधा न उत्पन्न हो, इसलिए प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए थे। मेले के दौरान जिला कलेक्टर नीरज वशिष्ठ, पुलिस अधीक्षक के अलावा कई वरिष्ठ अधिकारी कैंपों की निगरानी करने पहुंचे थे। पूरी व्यवस्था चाकचौबंद रखने के लिए 700 पुलिसकर्मी तैनात किए गए।
10 सीसीटीवी कैमरे और 3 ड्रोन दिखे
मेला क्षेत्र में किसी प्रकार की अव्यवस्था या अराजकता न फैले इसकी निगरानी 10 सीसीटीवी कैमरों और 3 ड्रोन के जरिए की जा रही थी। बता दें कि यहां पहले गुलेल का भी प्रयोग किया जाता रहा है। इस बार प्रशासन ने इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया। बताते हैं कि गोटमार मेले की यह परंपरा निभाने के दौरान लोगों के घायल होने से लेकर मौत की घटना भी सामने आई है। भले ही इसमें प्रशासन सुरक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था देता है। इस खूनी आयोजन पर पांढुर्णा विधायक निलेश उईके ने कहा कि वे आस्था से जुड़े हैंं। 10 साल से गोटमार खेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि मेले का यह आयोजन भावनात्मक है। खेल के दौरान लोग घायल होते रहे, लेकिन यह सिलसिल बंद नहीं कराया गया।
प्रेम कहानी से जुड़ी है मान्यता
दरअसल में यहां के लोग पुरानी मान्यता के अनुसार गोटमार मेले का आयोजन करते हैं। इनकी बात मान लें तो मेले की कहानी पांढुर्ना के युवक और सांवरगांव की युवती की प्रेम कहानी से जुड़ा है। यह मामला करीब 300 साल पहले का है। दोनों प्रेमी सामाजिक बंदिशों के कारण घर से भागे थे। वह जाम नदी पार करते समय गांवों के लोगों के बीच पत्थरबाजी में मारे गए थे।
यहां पर गोटमार मेले में जाम नदी के बीच पलाश का पेड़ और झंडा लगाया जाता है। मेले में लगाए जाने वाले झंडे को दोनों पक्ष हासिल करने के लिए मुकाबला करते हैं। इसी समय पत्थरबाजी की जाती है। भाग लेने वाला खिलाड़ी सबसे पहले पेड़ और झंडे तक पहुंचकर उसे हासिल कर पाता है, वह पक्ष विजेता माना जाता है। इसी परंपरा के कारण मेले का स्वरूप बाकी आयोजनों से अलग नजर आता है।
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